Saturday, November 28, 2015

इंसानियत का धर्म

परिवर्तन प्रकृति का नियम है, इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता। यही वजह है कि जीवनशैली में अनवरत बदलाव आ रहे हैं। परिस्थितियाँ शाश्वत सत्य बयान के हस्ताक्षर हैं। गरीबी और अमीरी के बीच खाई दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। सृष्टि में चहुँओर स्वार्थ, झूठ, लालच की ज्वालाएँ भटक रही हैं। क्रोध-हिंसा, साम्प्रदायिकता एवं प्रति हिंसा का दावानल दहक रहा है। जमानेभर की अर्थव्यवस्था पर धंधेबाजों का कब्जा है। जिनके पास धनबल और बाहुबल है, वे महान हैं और पूजनीय भी। सेक्स जीवन का आनंद और शोषणवृत्ति है तो नारी भोग की वस्तु! हालात सामने हैं। इंसानियत रक्तरंजित हो कराह रही है। सत्य और लहू के दरिया बह रहे हैं। न्याय का सिंहासन डोल रहा है। अनाचार, अत्याचार, व्यभिचार, बलात्कार मानो हमारे जीवन की जड़ों में मट्ठा (छाछ) बनकर समा गया है। गुरु-शिष्य के बीच ग्राहक और दुकानदार के रूप में संबंध परिपक्व होते नजर आ रहे हैं। अच्छे की पहचान कीमती और उजले वस्त्रों से की जा रही है। कपटी लोग सम्मान पा रहे हैं। ईमानदारी का सौदा हो रहा है। अत्याधुनिकता की होड़ में औरत स्वयं की अस्मिता के साथ खिलवाड़ कर रही है। कहने का मतलब कि आध्यात्मिक दृष्टि से यह संक्रमणकाल चल रहा है। परिवर्तन का दौर है। संक्रमण का शोर है। विनाश अभी और है। इसे ही हमारे सनातन संस्कृति से फलीभूत वेद-पुराण और उपनिषदों में कलियुग के नाम से संबोधित किया गया है। गरीबी और अमीरी के बीच खाई दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। सृष्टि में चहुँओर स्वार्थ, झूठ, लालच की ज्वालाएँ भटक रही हैं। क्रोध-हिंसा, साम्प्रदायिकता एवं प्रति हिंसा का दावानल दहक रहा है। जमानेभर की अर्थव्यवस्था पर धंधेबाजों का कब्जा है। माँ-बाप और गुरु का अपमान ही नहीं, उनकी हत्याएँ भी की जा रही हैं। कलियुग के ब्राह्मण, शिक्षाविदों और राजनेताओं को अपने दैहिक सुख और स्वार्थ की चिंता रह गई है। जो भी जितनी तेजी के साथ चीखता है, उसे ही सच मान लिया जाता है। न्याय और गवाह के साथ साक्ष्य भी खरीदे-बेचे जा रहे हैं। संतों का स्थान सम्मोहकों ने ले लिया है और धर्म के नाम पर भी धंधा चल रहा है। निर्धन अछूत बन गया है, भुखमरी का शिकार है किंतु पब्लिक के लिए सिर्फ एक समाचार है जिसकी अंतिम पक्ति होती है कि प्रशासन भी हर स्थिति से निपटने के लिए तैयार है। निःसंदेह यह महाप्रलय का संकेत है। आवश्यकता इस बात की है कि हम सृष्टि में समाहित होने, निराकार में एकाकार होने के प्रयास करें। इसके लिए इंसानियत का धर्म निभाएँ। वस्तुतः यही समय की माँग है।

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