Tuesday, December 1, 2015

एहसास

वैसे तो ज्ञान और एहसास के बारे में बहुत बातें की गयी हैं। पर, ये है क्या? शायद यह एक बात है जो शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती। जब हम दुखी या खुश होते हैं, तो हम वो भावनाएं दूसरों के साथ बाँट लेते हैं और अन्य व्यक्ति इसे समझ सकते हैं क्योंकि ये भावनाओं का एहसास कभी न कभी सबको होता हैं। हालांकि एहसास एक ऐसी चीज़ है जिससे काफी लोग अन्जान हैं। सिद्धार्थ हेस्स की कही बात बताते हैं कि जब भी आप किसी को कुछ व्यक्त करने की कोशिश करते हैं, तो आप जितना व्यक्त करना चाहते हैं उसका आधा ही कह पाते हैं और श्रोता की दृष्टि से वह केवल आधा समझा जाता है। स्वाभाविक रूप से, फिर, असामान्य भावनाओं के लिए, हमारे भाव और समझ दोनों सीमित हैं। इस प्रक्रिया के दौरान केवल कुछ भाव हैं जो शायद शब्दों में व्यक्त किए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, जैसे कि एक हल्की विद्युत् धारा शरीर के महत्वपूर्ण हिस्सों में बहती हो; उस समय कोई भी सांसारिक खुशी और दुख हम पर प्रभावी नहीं रहता; बस कुछ सनसनी सी महसूस होती है रीढ़ में, मस्तिष्क में और कुछ हिस्सों में। बुद्ध, जिन्होंने इस प्रक्रिया को इतनी प्रबलता से अनुभव किया है, फिर भी वे इस स्थिति के बारे में शांत रहे, जबकि उसको पाने के लिए निर्देश दिए गए हैं। यह एक ऐसी स्थिति है जिसका एहसास आपको सिर्फ खुद अनुभव करने से मिल सकता है। मौग्हम ने ‘दि रेज़र्स एज’ में अपनी कुशल कलात्मक शैली से क्या खूबसूरत पृष्ठभूमि बनाई है: “एक अंधकार से रौशनी छनती हुई आती है, धीरे से, जैसे कि एक रहस्यमयी आकृति पेड़ों के बीच छुपी हो, मेरे पैरों में जैसे झुनझुनी सी हुई और मेरे शरीर से होते हुए मेरे मस्तिष्क में ज्ञान का ऐसा सागर ले कर आई जो मानव की तुलना में कहीं अधिक था।” मौग्हम ने इस भाव को शब्दों में व्यक्त करने का महान प्रयास किया पर जब वास्तविक अनुभव की बात आती तो वे भी चुप हो जाते। “मैं कैसे बताऊँ कि मैंने क्या महसूस किया? मुझे जो आनंद मिला उसके उत्साह को व्यक्त करने के लिए मेरे पास कोई शब्द ही नहीं हैं।” एक साधू ने मुझे एक बार कहा था: “जब आप गहरी नींद में होते हो तो आप कोई सपना नहीं देखते; दिमाग बिलकुल शांत होता है। कच्चे तौर पर तुलना की जाए तो दिमाग की यह स्थिति आत्म-बोध के जैसी ही है। हालांकि यह आपको चेतन्य होते हुए अनुभव करने की ज़रुरत है। नहीं तो यह कुछ ऐसा हो जायेगा कि आपको लंदन घुमा के वापस आप के घर पर छोड़ दिया गया पर आपको कुछ भी याद नहीं क्योंकि आप नींद में थे।” कोई भी बहुत देर तक उस दिमागी स्थिति में नहीं रह सकता। जैसे कि रामकृष्ण कहते हैं कि नमक की गुड़िया सागर की गहराई को मापने के लिए पानी के अन्दर जाती है और इस प्रक्रिया में वो पानी में ही घुल जाती है। सभी में वो क्षमता नहीं होती कि एक बार परम अनुभव करने के बाद वापस इस भौतिक संसार में लौट सकें। उस परम ज्ञान का अनुभव करने के लिए अथक प्रयास करने की ज़रुरत होती है। हमें ज्ञान के विशाल समंदर को पार करना पड़ता है। हम उसे अपनी कल्पना के बल पर नहीं पा सकते। हम अपनी भौतिक ख़ुशी और धन पाने की इच्छा के साथ उस परम ज्ञान के अनुभव को कभी महसूस नहीं कर सकते। हमें हमेशा इन भौतिक वस्तुओं में उचित-अनुचित का फैसला करना होगा और धीरे-धीरे इस क्षणिक सुख से अपने आप को दूर करना होगा। हमें अपने अधिकार की भावना को छोड़ कर, समाज के लिए जो ज़रूरी हो वो सब दायित्व हमें निभाना चाहिए। लेकिन यह ध्यान रहे की हम उनमें फंस के न रह जायें। इसका यह मतलब नहीं कि हम अपने दायित्व ईमानदारी से नहीं निभा रहे। ईमानदारी से दायित्व निभाना पर बिना लगाव के, ये हमें सीखने की ज़रुरत है। बहुत से लोग कहते हैं कि बिना लगाव के ईमानदार रहना मुमकिन नहीं है। क्यूँ मुमकिन नहीं है? आप एक पौधा लगाते हैं। उस पौधे को रोज़ पानी देते हैं और सूरज की रौशनी उस पर पड़ने देते हैं। ये सब आप बहुत ईमानदारी से करते हैं। लेकिन इन सब के बावजूद अगर वो पौधा मर जाता है तो आप को उस सच्चाई को दुखी हुए स्वीकारना चाहिए। युक्तिकरण, वियुक्ति, लगातार प्रयास, भक्ति और समर्पण आपको परम ज्ञान की ओर ले जा सकते हैं जो आप में परिवर्तन, अतीत से वियोग और एकता की भावना लाता है। कुल मिला के शाश्वतता का एक ऐसा पल जिसका वर्णन स्पष्टता से शब्दों में नहीं किया जा सकता।

अवसाद - अभिशाप या बरदान

एक तरह का वरदान है अवसाद मौलाना वहीदुद्दीन ख़ानएक हालिया रिसर्च ने पाया है कि उदासी और निराशावाद जैसे लक्षण अवसाद को परिभाषित करते हैं लेकिन इसका सकारात्मक पहलू भी है। यह रिसर्च जो कि बेसल विश्वविद्यालय, स्विट्ज़रलैंड द्वारा कराई गई है, कहती है, निर्णय लेने वाले कार्यों में अवसाद ग्रस्त व्यक्ति सामान्य लोगों से अच्छा प्रदर्शन करते हैं। अवसाद क्या है? अवसाद मानसिक अशांति का संकेत होता है। इस तरह की अशांति बौद्धिकता बढ़ाती है। अवसाद क्यों होता है? अवसाद अभाव के कष्ट का लक्षण होता है। जब आप यह सोचते हैं कि आप किसी ऐसी चीज़ में बहुत पिछड़ रहे हैं, जिसकी आपको बहुत ख्वाहिश है, यह विचार आपको अवसाद की तरफ ले जाता है। अवसाद शारीरिक घटना नहीं है: यह मानसिक प्रकृति से संबंधित होता है। यदि आप महसूस करते हैं कि आपने वह पा लिया है जो आप पाने चाहते थे तो वह आपको संतुष्टि की भावना देता है। लेकिन जब आपको लगता है कि आप अपने लक्ष्य को पाने में असफल हो गए हैं तो इससे अवसाद होता है। पहले मामले में, आपकी ज़िंदगी में जल्द पूर्णविराम की स्थिति आ जाएगी, लेकिन दूसरे मामले में, आपका जीवन अल्पविरामों के साथ आगे बढ़ता रहेगा। अप्रिय अनुभव दर्दनाक होते हैं लेकिन वह उन्नत बौद्धिक विकास को आवश्यक योगदान देते हैं। इस तरह के अनुभव को महसूस किए बिना, कोई भी महान प्राप्तकर्ता नहीं बन सकता। इस सर्वे में सौ सफल लोगों की ज़िंदगी के बारे में अध्ययन किया गया, ताकि उनके समान तत्व निकाले जा सकें। उन्होंने यह पाया कि सभी महान सफल लोगों में एक समान लक्षण असंतोष की भावना थी। यह असंतोष न केवल अपने लक्ष्यों को पाने के लिए जुनूनी बनाता है बल्कि यह अधिक से अधिक हासिल कर लेने की इच्छा को भी पैदा करता है। तब यह सफलता के उच्च स्तर के लिए महत्वपूर्ण कुंजी बन जाता है, चाहे वह किसी भी प्रकार का काम हो। जहां संतुष्टि सब चीज़ों के आगे पूर्णविराम लगा देती है, असंतोष आपको कभी न रुकने वाली यात्रा की ओर ले जाता है। अवसाद का यह सबसे बड़ा फायदा है। इतिहास ने हमेशा दिखाया है कि जो लोग आराम में रहते हैं, और इस वजह से निराशा का शिकार नहीं होते, ऐसे इंसान किसी बड़ी सफलता को पाने में आमतौर पर नाक़ाम साबित होते हैं। लेकिन इससे उलट, जो विपरीत स्थितियों के कारण अवसाद का शिकार हो जाते हैं वही महान सफल इंसान के रूप में उभरकर आते हैं। आप ऐसा महसूस कर सकते हैं कि अवसाद एक ऐसी चीज़ है जिसे आप महसूस नहीं करना चाहते, लेकिन यह घटना प्रकृति के नियम द्वारा तैयार होती है। और जब प्रकृति के नियम की बात आती है, तो आपके पास उसे स्वीकार करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं होता। यदि प्रकृति के नियम के अनुसार, महान सफलता की यात्रा एक दर्दभरा अहसास कराती है, तो आपको वह अहसास प्राप्त करना पड़ेगा। इस तरह से, आपके पास केवल दो विकल्प हैं: या तो आप प्राकृतिक कीमत चुकाकर बड़ी सफलता हासिल करें, या महान सफलता को जाने बिना मर जाएं। प्रकृति ने इस बात को कईं तरीकों से व्यक्त किया। उदाहरण के लिए, यदि आपको सेब के जूस का एक ग्लास चाहिए, तो आपको एक सेब को घिसना पड़ेगा। सेब को बिना घिसे, आपको वह जूस नहीं मिल सकता। यह उन सब पर लागू होता है जो महान सफल इंसान बनना चाहते हैं। वह प्रकृति के कांटेदार पथ पर चलकर आभारी है क्योंकि इस शर्त को पूरा करे बिना कोई भी इच्छित लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकता। यह जीवन का एक सत्य है कि जो अपने मुंह में चांदी का चम्मच लिए पैदा होता है वह एक सामान्य इंसान की तरह जीता है जबकि जो बिना चांदी का चम्मच लिए पैदा होते हैं वह महान सफलता पाते हैं। शुरूआत में, अवसाद श्राप लग सकता है लेकिन अंत में, अवसाद वरदान साबित होता है। असल में, अवसाद जीवन का एक अस्थाई दौर होता है।

धर्म और विज्ञान

धर्म और विज्ञान एक दूसरे के विरोधी हैं , ऐसा माना जाता है। लेकिन इतिहास बताता है कि अब तक सभी संस्कृतियां विज्ञान और धर्म के दो प्रमुख स्त्रोतों पर ही अपने विकास के लिए निर्भर रही हैं। इन्हीं दो स्त्रोतों के सहारे उसने अपनी बौद्धिक तथा नैतिक शक्तियां प्राप्त की हैं। लेकिन अब यह सवाल उठने लगा है कि संपूर्ण मानव जाति के सुख के लिए जो धर्म और विज्ञान परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर थे , क्या वे आज भी मानव को सुख और शांति के मार्ग पर आगे ले जा रहे हैं ? क्या हम आज अपनी स्थिति से संतुष्ट है ? भविष्य के प्रति आशावादी हैं ? आज हमारी स्थिति इसलिए चिंताजनक है , क्योंकि विकास के हमारे मापदंड ही बदलते जमाने में गलत होते गए। धर्म और विज्ञान एक-दूसरे से अलग हुए। धर्म एक तरफ अंधविश्वासों और कर्मकांडों के जंजाल में फंस कर रह गया , तो विज्ञान ने निरी भौतिकता को ही विकास का आधार बना लिया। भारत ने ही नहीं , दुनिया के सभी देशों ने पिछले 50-55 वर्षों में विज्ञान के सहारे भौतिक उन्नति हासिल की है। विकास के इस दौर में विकसित , विकासशील और अविकसित की जो परिभाषा तय की गई , उसका मूल आधार केवल भौतिक था। संपत्ति और साधन ही मूलत: विकास का पैमाना बने। विकसित , विकासशील और अविकसित की जो परिभाषा तय की गई उसका मूल आधार केवल भौतिक था। अपने को विकसित साबित करने के लिए सभी देश भौतिक समृद्धि के पीछे पड़े रहे। लेकिन सिर्फ साधनों से विकास संभव नहीं हो सकता। भौतिक समृद्धि विकास का एक पहलू है। यह तो अब नितांत विज्ञानवादी भी मानने लगे हैं। इसकी कई वजहें हैं। प्रमुख वजह यह है कि विज्ञान के सहारे की गई प्रगति विकास के साथ विनाश भी ले आई। इसे देख कर सहमी मानवता ने माना कि इंसान के भौतिक विकास में नैतिकता की कमी रह गई है। इसलिए वह एकांगी हो गया है। इंसान केवल भौतिक जीव कदापि नहीं है , बल्कि जैसा हमने पढ़ा-लिखा-समझा है , वह केवल सामाजिक प्राणी भी नहीं है। इन दो बातों से बढ़ कर उसके व्यक्तित्व का एक और महत्वपूर्ण पहलू है। मनुष्य एक आध्यात्मिक प्राणि भी है। उसकी आध्यात्मिकता ही उसे नैतिक मार्ग पर चलने के लिए बाध्य करती है। इसीलिए , भौतिक संपन्नता और सामाजिक प्रतिष्ठा पाने के बाद भी जब तक वह आध्यात्मिकता का दामन पकड़ नहीं लेता तब तक अपने को पूर्ण महसूस नहीं करता। विकास की दौड़ में उसके व्यक्तित्व के इस महत्वपूर्ण पहलू पर कभी गौर नहीं किया गया। विज्ञान के जरिए उसने जो भी विकास हासिल किया , वह कोरा भौतिक विकास रहा। आध्यात्मिकता के अभाव में विज्ञान के सहारे की गई विध्वंसक उन्नति एकांगी और कभी-कभी विध्वंसक साबित हुई। परमाणु बम इसका उदाहरण है। मानव कल्याण के लिए निर्मित विज्ञान का यह विनाशकारी रूप देखने के बाद ही उसकी भौतिकता को नैतिक अनुष्ठान की जरूरत महसूस की गई। अब तक विकास के नाम पर जितने भी उपाय किए गए हैं , उनका एक ही उद्देश्य रहा है- अधिक से अधिक उत्पादन। कृषि के क्षेत्र में इसका उदाहरण है हरित क्रांति। उत्पादन वृद्धि के लिए बड़े जोर-शोर के साथ लागू की गई हरित क्रांति ने कुछ समय तक चुंधिया देने वाले नतीजे दिए। लेकिन आज उसका विनाशकारी रूप भी हमारे सामने आ गया है। रिकॉर्ड तोड़ उत्पादन लेने के लिए जिन रासायनिक खादों का प्रयोग किया गया , उनकी वजह से आज हमारी भूमि बंजर हो गई है। इसीलिए संपन्नता के बावजूद आज इंसान को अपनी दिशाहीनता का अहसास हो रहा है। जिस सुखी और वैभवशाली समाज का सपना लेकर वह आगे बढ़ा था , वह ऐसा नहीं था। तब सुखी समाज के निर्माण के लिए एक विचार आगे आया कि विकास के लिए केवल भौतिक ही नहीं , आध्यात्मिक पहलुओं पर भी गौर करना चाहिए। क्योंकि धर्म के पास ही विवेक और नैतिकता के वे आधार हैं जिनके सहारे विज्ञान की घोर भौतिकता पर विजय पाई जा सकती है। इसी विचार ने जन्म दिया है ' साइंस , रिलीजन एंड डेवलपमेंट ' नाम की हमारी परियोजना को , जिसका उद्देश्य है विज्ञान और धर्म के अच्छे तत्वों के सहारे एक सुखी समाज का निर्माण करना। विज्ञान और धर्म मिल कर विश्व के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इनके आधार से बनी नई दुनिया में प्रमुख तत्व होंगे परोपकार और सहकारिता। असल में समाज के निर्माण में हर इंसान की भूमिका और योगदान हो , इसलिए शिक्षा के आधार इंसान की क्षमताओं को बढ़ाने वाले होने चाहिए। तकनीकी , कला-कौशल , सामाजिक , नैतिक और आध्यात्मिक क्षमताओं को बढ़ाने वाली शिक्षा से हर इंसान का जीवन अर्थपूर्ण हो सकता है जो आगे चल कर सकारात्मक सामाजिक बदलाव ला सकता है। (प्रस्तुति: संध्या पेडणेकर)