Thursday, September 29, 2016

विश्व शांति को लेकर मानवीय दृष्टिकोण -1

                                 हम जब प्रातः जागते हैं और रेडियो सुनते हैं या समाचार पत्र पढ़ते हैं तो हमारा सामना उन्हीं दुखद समाचारों से होता है - हिंसा, अपराध, युद्ध और आपदाएँ। मुझे याद नहीं पड़ता कि एक भी दिन ऐसा गया हो जब कहीं से कोई भयंकर घटना का समाचार न मिला हो। आज के इस आधुनिक युग में भी यह बात स्पष्ट है कि किसी का भी मूल्यवान जीवन सुरक्षित नहीं है। किसी भी पूर्व पीढ़ी को इतने बुरे समाचारों का सामना नहीं करना पड़ा है जिनका सामना हम कर रहे हैं; भय और तनाव की यह सतत अनुभूति किसी भी संवेदनशील और करुणाशील व्यक्ति को हमारे आधुनिक विश्व के विकास को लेकर गंभीरता से प्रश्न उठाने पर विवश करना चाहिए।

                                    यह विडंबना ही है कि अधिक गंभीर समस्याएँ औद्योगिक रूप से अधिक विकसित समाजों से आती है। विज्ञान और तकनीक ने कई क्षेत्रों में चमत्कारिक कार्य किए हैं, पर मनुष्य की मूलभूत समस्याएँ बनी हुई है। अभूतपूर्व साक्षरता है, पर फिर भी लगता नहीं कि इस वैश्विक शिक्षा ने अच्छाई को बढ़ावा दिया हो, अपितु इसके स्थान पर केवल मानसिक अशांति और असंतोष की ही बढ़त हुई है। हमारे भौतिक विकास और तकनीक में बढ़त को लेकर कोई संदेह नहीं पर फिर भी यह पर्याप्त नहीं है, क्योंकि अभी तक हम शांति और सुख लाने में या पीड़ाओं पर काबू पाने में सफल नहीं हुए हैं।

                          हम केवल निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि हमारे उन्नति तथा विकास में कोई गंभीर चूक हुई होगी और यदि हमने समय रहते उसे रोका नहीं तो मानवता के भविष्य के लिए उसके विनाशकारी परिणाम होंगे। मैं विज्ञान और तकनीक के विरोध में बिलकुल भी नहीं हूँ – उन्होंने मानवता के समग्र अनुभव, हमारे भौतिक सुख तथा कल्याण में और जिस विश्व में हम रह रहे हैं, उसकी अधिक समझ में बहुत अधिक सहयोग दिया है। पर यदि हम विज्ञान और तकनीक पर बहुत अधिक बल दें तो हमारा मानवीय ज्ञान और समझ के उन अंगों से संपर्क टूटने का खतरा है जो ईमानदारी और परोपकार की ओर प्रेरित करते हैं।

                               विज्ञान और तकनीक में यद्यपि अनगिनत भौतिक सुख उपलब्ध कराने की क्षमता है, पर यह हमारे सदियों पुराने आध्यात्मिक तथा मानवीय मूल्यों का स्थान नहीं ले सकते, जिन्होंने विश्व सभ्यता को उनके सभी राष्ट्रीय रूप में जैसा हम जानते हैं, एक व्यापक आकार दिया है। कोई भी विज्ञान के अभूतपूर्व भौतिक लाभ को नकार नहीं सकता, पर हमारी आधारभूत मानवीय समस्याएँ बनी हुई है; हम अभी भी उन्हीं का सामना कर रहे हैं,यदि और अधिक नहीं तो दुख, भय तथा तनाव। इसलिए यह तर्कोचित ही है कि एक ओर भौतिक विकास और दूसरी और आध्यात्मिक मानवीय मूल्यों के विकास के बीच संतुलन साधा जाए। इस समन्वय को लाने के लिए हमें अपने मानवीय मूल्यों को पुनर्जीवित करना होगा।

                                मेरा यह पक्का विश्वास है कि कई लोग आज के वैश्विक नैतिक संकट को लेकर मेरी चिंता से सहमति रखते हैं और सभी मानवतावादी और धर्म अभ्यासी भी, जो हमारे समाज को अधिक करुणामय न्यायपूर्ण और एक समान बनाने को लेकर चिंतित हैं, मेरे आग्रह से जुड़ेंगे। मैं एक बौद्ध या एक तिब्बती के रूप में नहीं बोल रहा। न ही मैं अंतर्राष्ट्रीय राजनीति (हालांकि मैं अपरिहार्य रूप से इन विषयों पर टिप्पणी देता हूँ) के विशेषज्ञ की ही तरह बोल रहा हूँ। बल्कि मैं मात्र एक मनुष्य की तरह बोलता हूँ, मानवीय मूल्यों के समर्थक के रूप में जो न केवल महायान बौद्ध धर्म की, पर सभी विश्व के महान धर्मों की नींव है। इस दृष्टिकोण से मैं आपके साथ अपना व्यक्तिगत दृष्टिकोण बाँट रहा हूँ – कि

                  १ वैश्विक मानवतावाद वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए आवश्यक है।
                  २ करुणा विश्व शांति का स्तंभ है।
                  ३ इस दृष्टिकोण से विश्व के सभी धर्म शांति के पक्षधर हैं जैसे कि किसी भी आदर्श वाले मानवतावादी।
                 ४ प्रत्येक व्यक्ति का सार्वभौमिक उत्तरदायित्व है कि वह मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु संस्थाओं को स्वरूप दें।

                  मानवीय व्यवहार को परिवर्तित करते हुए मानवीय समस्याओं का समाधान
                          आज हम जिन कई समस्याओं का सामना कर रहे हैं, उनमें से कुछ प्राकृतिक आपदाएँ हैं और उन्हें स्वीकारा जाना चाहिए और उनका सामना समभाव से करना चाहिए। पर अन्य कई हमारी गलतफहमियों के कारण हमारी अपनी बनाई हुई है और सुधारी जा सकती है। इस प्रकार जब हम लोग आधारभूत मानवता, जो हमें आपस में एक बड़े परिवार की तरह जोड़कर रखती है, को भूल कर छोटी-छोटी बातों के लिए झगड़ते हैं तो विचारधाराओं का संघर्ष, फिर वह चाहे राजनीतिक हो या धार्मिक, उत्पन्न होता है। हमें सदा स्मरण रखना चाहिए कि दुनिया के विविध धर्म, विचारधाराएँ और राजनीतिक प्रणालियाँ मनुष्यों को सुख देने के लिए बनाई गई है। हमें इस मूलभूत लक्ष्य को नहीं भूलना और किसी भी स्थिति में लक्ष्य पर साधन को हावी नहीं होने देना चाहिए, वस्तु और विचारधारा पर मानवता की श्रेष्ठता सदा बनाई रखनी चाहिए।

                            अब तक मानवता के समक्ष – देखा जाए तो इस धरती के सभी सत्वों के समक्ष, जो सबसे बड़ा खतरा है वह परमाणु विनाश का खतरा है। मुझे इस खतरे के बारे में अधिक विस्तार से बताने की आवश्यकता नहीं है, परन्तु मैं विश्व के समस्त परमाणु शक्तियों के नेताओं से अपील करना चाहूँगा, जो वास्तव में अपने हाथों में विश्व का भविष्य धरे बैठे हैं, उन वैज्ञानिकों और तकनीकी लोगों से जो विनाश के इन अभूतपूर्व अस्त्र शस्त्रों के निर्माण में लगे हुए हैं, और कुल मिलाकर उन सभी लोगों से जो इन नेताओं को प्रभावित करने की स्थिति में हैं: मैं उनसे अपील करता हूँ कि वे अपनी बुद्धि को काम में लाएँ तथा सभी परमाणु हथियारों को विखंडित और नष्ट करने का कार्य प्रारंभ करें। हम जानते हैं कि परमाणु युद्ध होने की स्थिति में कोई विजेता न होगा, क्योंकि कोई जीवित न रहेगा। क्या ऐसे अमानवीय और हृदयहीन विनाश की सोच भी डरा देने वाली नहीं है? और क्या यह तर्कसंगत नहीं कि हम अपने ही विनाश के कारण को दूर करें, जब हम कारण जानते हैं और ऐसा करने हेतु हमारे पास यह करने के लिए समय और उपाय दोनों ही उपलब्ध हैं? प्रायः हम अपनी समस्या का समाधान नहीं कर पाते क्योंकि या तो हम इसका कारण नहीं जानते, या फिर यदि हम समझते हैं तो हमारे पास उसके समाधान का उपाय नहीं होता। परमाणु खतरे के विषय में ऐसा नहीं है।

                            चाहे उनका संबंध विकसित प्रजाति से हो, जैसे मनुष्य अथवा साधारण पशु , सभी सत्व मूल रूप से शांति, आराम तथा सुरक्षा चाहते हैं। जीवन मूक पशुओं के लिए उतना ही प्रिय है जितनी किसी मनुष्य के लिए, एक छोटा कीड़ा भी अपने जीवन पर आए खतरे से अपने को बचाने का प्रयास करता है। जिस प्रकार हममें से प्रत्येक जीना चाहता है और मरना नहीं चाहता, यही बात ब्रह्मांड के सभी जीव-जंतुओं के साथ है, यद्यपि उनकी इसे प्रभावित कर पाने की शक्ति एक अलग बात है।
व्यापक रूप से कहा जाए तो सुख तथा दुख दो तरह के होते हैं, मानसिक और शारीरिक और इन दोनों में से मैं सोचता हूँ कि मानसिक दुख और सुख अधिक तीव्र होते हैं। इसलिए मैं दुख को झेलने और सुख के स्थायी भाव की स्थिति के लिए चित्त शोधन पर बल देता हूँ। पर सुख को लेकर मेरी एक और सामान्य और ठोस सोच भी है, आंतरिक शांति, आर्थिक विकास और सबसे ऊपर विश्व शांति का समन्वय। मुझे लगता है कि ऐसे लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए वैश्विक उत्तरदायित्व की भावना आवश्यक है, नस्ल, रंग, लिंग या राष्ट्रीयता से ऊपर उठी, सभी के लिए एक गहरी चिंता का भाव।

                                वैश्विक उत्तरदायित्व की इस सोच के आधार के पीछे एक सरल तथ्य यह है कि साधारण रूप से अन्य सभी लोगों की इच्छाएँ मेरी इच्छाओं की ही तरह हैं। प्रत्येक सत्व सुख चाहता है, दुख नहीं। यदि हम बुद्धिमान मानव होने के नाते, इस तथ्य को स्वीकार नहीं करते तो इस ग्रह पर और अधिक दुख होंगे। यदि हम जीवन को लेकर आत्मकेंद्रित दृष्टिकोण अपनाएँ और अपने स्वार्थ साधने के लिए निरंतर दूसरों को काम में लाने का प्रयास करें तो हमें कुछ अस्थायी
लाभ हो सकता है, परन्तु दीर्घ काल में हम वैयक्तिक सुख तक प्राप्त नहीं कर सकेंगे, फिर विश्व शांति का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

                                सुख की खोज में मनुष्य ने विभिन्न उपाय अपनाए हैं, जो अधिकतर क्रूर और घृणास्पद रहे हैं। एक मनुष्य होते हुए उनका व्यवहार मानवोचित नहीं है और वे अपने स्वार्थ लाभ के लिए अपने साथियों और अन्य सत्वों को पीड़ा पहुँचाते हैं। अंत में उनके अदूरदर्शी कार्य स्वयं को साथ ही दूसरों को दुख पहुँचाते हैं। मानव रूप में जन्म लेना ही अपने-आप में असाधारण होता है और इस अवसर का प्रभावी और कौशलपूर्ण रूप से यथासंभव लाभ उठाने में ही समझदारी है। हमारे पास वैश्विक जीवन प्रक्रिया को लेकर एक सही दृष्टिकोण होना चाहिए ताकि दूसरों की कीमत पर एक व्यक्ति या एक समूह विशेष का सुख या प्रतिष्ठा प्राप्त करने का प्रयास न हो। इन सभी के लिए वैश्विक समस्या को लेकर एक नये दृष्टिकोण की आवश्यकता है। विश्व, तीव्र गति से हो रहे प्रौद्योगिक विकास और अंतर्राष्ट्रीय व्यवसाय साथ ही बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के कारण और छोटे से छोटा और अधिक से अधिक अन्योन्याश्रित होता जा रहा है। अब हम एक-दूसरे पर बहुत अधिक निर्भर हैं। प्राचीन काल में समस्याएँ परिवार तक सीमित हुआ करती थी और स्वाभाविक तौर पर उनका निपटारा भी पारिवारिक स्तर पर ही हो जाया करता था, पर अब परिस्थिति बदल चुकी है। आज हम इतने अधिक अन्योन्याश्रित हैं, इतने अधिक आपस में जुड़े हुए हैं कि एक वैश्विक बंधु-भगिनी भाव और एक समझ और विश्वास, कि हम एक बड़े मानवीय परिवार के सदस्य हैं के अभाव में हम अपने अस्तित्व के संकट से उबरने तक के बारे में नहीं सोच सकते, शांति और सुख तो दूर की बात है।

                                       किसी एक देश की समस्या वह देश अकेला नहीं सुलझा सकता, अब बहुत कुछ दूसरे देशों के हितों, व्यवहार और सहयोग पर निर्भर करता है। विश्व की समस्याओं को लेकर एक वैश्विक मानवीय पहल ही विश्व शांति का अकेला शक्तिशाली आधार दिखाई देता है। इसका क्या अर्थ है? हम पहले ही उल्लेखित इस तथ्य से प्रारंभ करते हैं कि सभी सत्व सुख की कामना करते हैं और दुख नहीं चाहते। तो फिर एक मानव परिवार के सदस्य के नाते जिन सदस्यों से हम घिरे हैं उनकी भावनाओं और आशाओं की और ध्यान न देते हुए मात्र अपने सुख के पीछे भागना नैतिक रूप से गलत और व्यावहारिक रूप से मूर्खतापूर्ण होगा। अधिक बुद्धिमानी अपने सुख की खोज करते हुए दूसरों के विषय में सोचना भी है। यह हमें जिसे मैं बुद्धिमानी भरा स्वार्थ कहता हूँ उसकी ओर ले जाएगा जो आशा है कि उसे स्वार्थ से जुड़े समझौते या उससे भी बेहतर परस्पर हित में परिवर्तित कर सकता है।

                                         यद्यपि राष्ट्रों के बीच बढ़ती अन्योन्याश्रितता से सहानुभूतिपूर्ण सहयोग के उत्पन्न होने की आशा की जा सकती है, पर जब तक लोग दूसरों की भावनाओं और सुख के प्रति उदासीन रहेंगे तब तक एक सच्चे सहयोग की भावना की प्राप्ति नहीं हो सकती। जब लोग अधिकांश रूप से लालच और ईर्ष्या से प्रेरित हों तो उनके लिए सद्भाव से जीवन जीना संभव नहीं है। संभव है कि एक आध्यात्मिक दृष्टिकोण सभी राजनैतिक समास्याओं का समाधान न कर पाए जो कि वर्तमान आत्मकेंद्रित सोच के कारण उत्पन्न हुई हो, पर एक लम्बे समय में यह उन समस्याओं के समाधान का आधार बनेगा जिनका सामना आज हम कर रहे हैं।

                                          दूसरी ओर, यदि मानव जाति अपनी समस्याओं को केवल अस्थायी औचित्य के दृष्टिकोण मात्र से देखती रही तो भविष्य की पीढ़ियों को बहुत अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। विश्व की जनसंख्या बढ़ रही है और हमारे संसाधन तेजी से समाप्त होते जा रहे हैं। उदाहरण के लिए वृक्षों की ओर ही देख लीजिए। कोई नहीं जानता कि बड़े पैमाने पर वनों की कटाई के हमारी जलवायु, मिट्टी और कुल मिलाकर वैश्विक पारिस्थितिकी पर क्या दुष्परिणाम होंगे। हम समस्याओं को अपने समक्ष पा रहे हैं क्योंकि लोग समूची मानव जाति के बारे में न सोचते हुए केवल अपने अल्पकालीन स्वार्थ को साधने में लगे हैं। वे पृथ्वी के बारे में नहीं सोच रहे और न ही इसके सार्वभौमिक जीवन पर प्रभाव के बारे में। यदि हमारी वर्तमान पीढ़ी इसके बारे में नहीं सोचती तो संभवतः भावी पीढ़ियाँ इससे निपट न पाएँ।
विश्व शांति के स्तंभ के रूप में करुणा

                                             बौद्ध मनोविज्ञान के अनुसार हमारी अधिकांश कठिनाइयों का कारण हमारी भावुक कामना और वस्तुओं के प्रति आसक्ति है, जिसे हम भ्रांति से स्थायी वस्तुएँ मान बैठते हैं। अपनी इच्छाओं तथा मोह की वस्तुओं के पीछे भागने के लिए आक्रामकता और प्रतिस्पर्धा के उपयोग महत्त्वपूर्ण उपकरण माने जाते हैं। यह मानसिक प्रक्रिया सरलता से कार्य में परिवर्तित होती है और स्वाभाविक प्रभाव के तौर पर भावनाओं को जन्म देती है। मानवीय मस्तिष्क में इस प्रकार की प्रक्रियाएँ अनंतकाल से चली आ रही है, परन्तु आधुनिक परिस्थितियों में उनको कार्यान्वित करना अधिक प्रभावी हो गया है। इन विषों - भ्रम, लोभ और आक्रामकता को नियंत्रित और नियमित करने के लिए हम क्या कर सकते हैं? क्योंकि यही विष हैं जो विश्व की लगभग सभी समस्याओं के मूल में हैं।

                                       महायान बौद्ध परंपरा में शिक्षित होने के कारण मैं मानता हूँ कि प्रेम और करुणा ही विश्व शांति का नैतिक ताना-बाना है। पहले मुझे स्पष्ट करने दें कि करुणा से मेरा क्या तात्पर्य है। जब किसी निर्धन व्यक्ति के लिए आप में दया या करुणा होती है तो आप इसलिए दया दिखाते हैं क्योंकि वह निर्धन है। आपकी करुणा, परोपकार की प्रेरणा की भावना पर आधारित होती है। दूसरी ओर अपनी पत्नी, अपने पति, अपने बच्चे या अंतरंग मित्र के साथ प्रेम प्रायः आसक्ति पर आधारित होता है। जब आपकी आसक्ति परिवर्तित होती है तो आपकी दया भी परिवर्तित होती है। यह गायब भी हो सकती है। यह वास्तविक प्रेम नहीं है। वास्तविक प्रेम आसक्ति पर नहीं अपितु परोपकार पर आधारित होता है। इस स्थिति में जब तक सत्व दुखी रहेंगे तब तक आपकी करुणा दुख के प्रति एक मानवीय संवेदना के रूप में बनी रहेगी।
हमें अपने अंदर इस प्रकार की करुणा को विकसित करने का प्रयास करना चाहिए और हमें इसे एक सीमित मात्रा से असीमित मात्रा तक विकसित करना चाहिए। स्वाभाविक है कि सभी सत्वों के प्रति भेदभावहीन, सहज और असीमित करुणा साधारण प्रेम के समान नहीं है, जो किसी का मित्रों अथवा परिजनों के प्रति होता है, जो अज्ञान, इच्छा और आसक्ति से मिश्रित होता है। हमें जिस प्यार को बढ़ावा देना चाहिए, वह यह व्यापक प्रेम है जो किसी ऐसे व्यक्ति के लिए भी हो सकता है, जिसने आपका अहित किया है, आपका वैरी।

                                     करुणा के पीछे तर्क यह है कि हममें से हर एक दुख को टालना चाहता है और सुख प्राप्त करना चाहता है। यह मैं के एक उचित भावना पर आधारित है जो सुख की सार्वभौमिक इच्छा का निर्धारण करता है। निश्चित रूप से सभी सत्व एक जैसी इच्छाओं के साथ जन्म लेते हैं और हर एक को उन्हें पूरा करने का समान अधिकार होना चाहिए। यदि मैं स्वयं की तुलना दूसरों के साथ करता हूँ, जो अनगिनत हैं, तो मैं अनुभव करता हूँ कि अन्य अधिक महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि मैं मात्र एक व्यक्ति हूँ जबकि अन्य तो बहुत सारे हैं। इसके अतिरिक्त, तिब्बती बौद्ध परंपरा हमें सभी सत्वों को अपनी प्रिय माँ के रूप में देखने की और उन सभी से प्रेम कर कृतज्ञता व्यक्त करने की भी शिक्षा देती है। क्योंकि बौद्ध सिद्धांतानुसार हम अनगिनत बार जन्म और पुनर्जन्म लेते हैं और यह सोचना संभव है कि प्रत्येक सत्व किसी न किसी समय में हमारे अभिभावक रहे होंगे। इस प्रकार ब्रह्मांड के सभी सत्वों में पारिवारिक संबंध है।

                                  कोई धर्म में विश्वास करता हो या नहीं, पर ऐसा कोई नहीं जो करुणा और प्रेम को नहीं सराहता। हमारे जन्म के पल से, हम अपने अभिभावकों की देखभाल और दया पर निर्भर रहते हैं, बाद के जीवन में रोग और वृद्धावस्था का सामना करते हुए हम फिर दूसरों की दया पर निर्भर होते हैं। यदि हम अपने जीवन के प्रारंभ और अंत में दूसरों की दया पर निर्भर होते हैं तो फिर हम जीवन के मध्य काल में दूसरों के साथ दया का व्यवहार क्यों नहीं कर सकते?
सहृदयता (जिसमें सभी मनुष्यों के प्रति आत्मीयता का भाव हो) के विकास में जिसे हम परंपरागत धार्मिक तौर-तरीकों से जोड़कर देखते हैं उस प्रकार की धार्मिकता की आवश्यकता नहीं होती। यह केवल उन लोगों के लिए नहीं है जिनका धर्म में विश्वास है, अपितु यह जाति, धर्म विशेष अथवा राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर हर एक के लिए है। यह हर उस व्यक्ति के लिए है जो स्वयं को सबसे पहले मानव परिवार का सदस्य मानता या मानती है और जो बातों को एक व्यापक और लंबी अवधि के दृष्टिकोण से देखता, देखती है। यह एक शक्तिशाली भावना है जिसका हमें विकास और प्रयोग करना चाहिए, जबकि हम प्रायः इसको अनदेखा कर देते हैं, विशेषकर अपने जीवन के चरम समय में जब हम सुरक्षा का एक झूठा भाव अनुभव करते हैं।

                                          जब हम दीर्घ अवधि के दृष्टिकोण को लेकर सोचते हैं तो यह तथ्य कि सभी सत्व सुख चाहते हैं और पीड़ा से बचना चाहते हैं और अनगिनत अन्‍य के संदर्भ में अपनी महत्त्वहीनता, तो हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि दूसरों के साथ अपनी वस्तुएँ बाँटना उपयुक्त है। जब आप इस तरह के दृष्टिकोण में प्रशिक्षित होते हैं तो करुणा की एक सच्ची भावना - दूसरों के लिए प्रेम और सम्मान की एक सच्ची भावना संभव है। वैयक्तिक सुख का भाव अपने आप ही एक आत्मकेंद्रित प्रयास के रूप में समाप्त होकर, यह दूसरों के प्रति प्रेम और सेवा प्रक्रिया का स्वतः और बेहतर उत्पाद हो जाता है।
आध्यात्मिक विकास का एक और परिणाम, दिन प्रतिदिन के जीवन में सबसे लाभकारी यह होता है कि यह चित्त की शांति और प्रत्युत्पन्नमति देता है। हमारे जीवन निरंतर परिवर्तनशील हैं और अपने साथ कई कठिनाइयाँ लाते हैं। एक शांत और स्पष्ट चित्त से सामना करने पर समस्याओं का समाधान सफलतापूर्वक होता है।

                                इसके विपरीत जब हम घृणा, स्वार्थ, ईर्ष्या और क्रोध के कारण चित्त पर नियंत्रण खो देते हैं तो हम अपनी निर्णय क्षमता भी खो बैठते हैं। हमारे चित्त अंधे हो जाते हैं और उन मति भ्रष्ट क्षणों में कुछ भी हो सकता है, युद्ध तक। इसलिए करुणा और प्रज्ञा का प्रयोग सभी के लिए उपयोगी होता है, विशेषकर उन लोगों के लिए जो राष्ट्रीय मामलों को चलाने के उत्तरदायी हैं, जिनके हाथों में विश्व शांति का ढांचा तैयार करने की शक्ति और अवसर है।
विश्व शांति के लिए विश्व के धर्म

                                  अभी तक जिन सिद्धांतों की चर्चा हुई है वह विश्व भर के सभी धर्मों की नैतिक शिक्षा के अनुसार है। मैं यह विश्वास रखता हूँ कि विश्व के सभी प्रमुख धर्म-बौद्ध, ईसाई, कन्फूशिवाद, हिंदू, इस्लाम, जैन, यहूदी, सिक्ख, ताओवाद, पारसी-के प्रेम को लेकर आदर्श एक से हैं, आध्यात्मिक अभ्यास से मानवता का भला करने का समान लक्ष्य, और धर्म का पालन करने वालों को एक अच्छा मानव बनाने का प्रभाव भी एक सा ही है। सभी धर्म चित्त, काय और वाक को परिष्कृत करने के लिए नैतिक सिद्धांतों की शिक्षा देते हैं। सभी हमें झूठ न बोलने, चोरी न करने की या दूसरों के प्राण न लेने आदि की शिक्षा देते हैं। मानवता के महान शिक्षकों द्वारा दिए गए सभी नैतिक उपदेशों का एक समान लक्ष्य है निस्वार्थ भाव। महान शिक्षक अपने अनुयायियों को अज्ञान के कारण नकारात्मक कार्यों के मार्ग पर चलने से रोककर उन्हें अच्छाई के मार्ग से परिचय करना चाहते थे।

                                सभी धर्म स्वार्थ और अन्य बुराइयों की जड़ अनुशासनहीन चित्त पर नियंत्रण की आवश्यकता को लेकर सहमत हैं और प्रत्येक एक मार्ग की शिक्षा देता है जो ऐसे आध्यात्मिक अवस्था की ओर ले जाता है, जो शांतिपूर्ण, अनुशासित, नैतिक और प्रज्ञावान होता है। इस अर्थ में मेरा मानना है कि सभी धर्मों का मूलत: एक ही संदेश है। रुढ़ियों में अंतर का कारण समय, परिस्थिति और साथ ही सांस्कृतिक प्रभाव हो सकते हैं, वास्तव में जब हम धर्म के गूढ़ पक्ष की चर्चा करते हैं तो बौद्धिक चर्चा का कोई अंत नहीं है। पर अपने नित्य प्रति के जीवन में व्यावहारिकता को लेकर छोटे-छोटे अंतरों पर तर्क करने के स्थान पर सभी धर्मों की अच्छी शिक्षाओं के साझा विचार को अपनाना कहीं अधिक लाभकारी है।

                                   कई विभिन्न धर्म हैं जो मानवता को आराम और सुख देते हैं ठीक उसी तरह जैसे विभिन्न रोगों के लिए विशिष्ट उपचार उपलब्ध हैं। क्योंकि सभी धर्म अपने ढंग से सत्वों को दुख को दूर कर सुख प्राप्त करना सिखाते हैं। और यद्यपि हम धार्मिक सच्चाइयों की विशिष्ट विवेचना को अपनाने के लिए कारण खोज सकते हैं, परन्तु एकता के और बड़े कारण हैं जो मानवीय हृदय से उत्पन्न होते हैं। एक बड़ा कारण है। प्रत्येक धर्म अपने ढंग से मनुष्य की कठिनाइयों को कम करने का प्रयास करता है और विश्व सभ्यता में योगदान देता है। धर्म परिवर्तन प्रश्न नहीं है। उदाहरण के लिए, मैं अन्य लोगों को बौद्ध धर्म में परिवर्तित करने या केवल बौद्ध चिंतन को ही आगे बढ़ाने को नहीं मानता। अपितु मैं यह सोचने का प्रयास करता हूँ कि एक बौद्ध मानवतावादी के नाते मैं किस प्रकार मानवीय खुशी में योगदान दे सकता हूँ।

                                       दुनिया के धर्मो के बीच आधारभूत समानता की ओर ध्यान दिलाते हुए, मैं अन्य सभी धर्मों की तुलना में किसी एक धर्म को अच्छा बताने का पक्ष नहीं लेता, और न ही मैं किसी नये विश्व धर्म की खोज करता हूँ। मानवीय अनुभव और विश्व सभ्यता को समृद्ध बनाने के लिए विश्व के सभी विभिन्न धर्मों की आवश्यकता है। हमारे मानवीय मस्तिष्क की विभिन्न क्षमताओं और स्वभाव के कारण शांति और सुख प्राप्त करने के लिए अलग उपायों की आवश्यकता होती है। यह भोजन की तरह है। कुछ लोगों को ईसाई धर्म ज्यादा आकर्षित करता है, तो अन्य कईयों को बौद्ध, क्योंकि इसमें कोई सृजनकर्ता नहीं है और सब कुछ आपके अपने कर्मों पर निर्भर करता है। हम इसी तरह से दूसरे धर्मों के पक्ष में भी तर्क दे सकते हैं। इसलिए यह बात तो स्पष्ट है, मानवता को जीवन शैलियों से तालमेल बिठाने के लिए, विभिन्न आध्यात्मिक आवश्यकताओं के लिए और विरासत में मिली हर एक व्यक्ति की राष्ट्रीय परम्परा के लिए विश्व के सभी धर्मों की आवश्यकता है।

                                        इसी दृष्टिकोण से मैं विश्व के विभिन्न भागों में धर्मों के बीच किए जा रहे बेहतर तरीके से समझने के प्रयासों का स्वागत करता हूँ। आज तो विशिष्ट रूप से इसकी तुरन्त आवश्यकता है। यदि सभी धर्म मानवीयता को और अच्छा करने को अपना मुख्य चिंतन बना लें तो वे विश्व शांति के लिए सरलता और सद्भाव से कार्य कर सकते हैं। अंतर्धर्मीय समझ सभी धर्मों को एक साथ कार्य करने की आवश्यक एकता लाएगी। परन्तु यद्यपि यह एक महत्त्वपूर्ण कदम है, पर हमें याद रखना चाहिए कि इसका कोई तत्कालीन और सरल समाधान नहीं है। विभिन्न धर्मों के बीच जो सैद्धांतिक मतभेद हैं हम उन्हें अनदेखा नहीं कर सकते और न ही हम वर्तमान धर्मों के स्थान पर किसी नये सार्वभौमिक विश्वास को ही रख सकते हैं। प्रत्येक धर्म का अपना कुछ विशिष्ट योगदान होता है और प्रत्येक अपने ढंग से किसी विशिष्ट समुदाय के लोगों के लिए जैसा वे जीवन को समझते हैं, उपयुक्त है। विश्व को सभी धर्मों की जरूरत है।

                                          उन धार्मिक अभ्यासियों के समक्ष, जो विश्व शांति को लेकर चिंतित हैं, आज दो प्राथमिक कार्य हैं। पहला, हमें विभिन्न धर्मों के बीच बेहतर समझ को विकसित करना होगा, ताकि सभी धर्मों के बीच कार्य करने के अनुकूल एकता स्थापित की जा सके। यह एक-दूसरे के मतों का सम्मान करते हुए और मानवता के कल्याण की हमारी समान सोच पर बल देकर कुछ अशों में प्राप्त की जा सकती है। दूसरा, हमें मूलभूत आध्यात्मिक मूल्यों पर एक ऐसी व्यावहारिक आम सहमति बनानी होगी, जो हर एक मनुष्य के हृदय को स्पर्श करे और साधारण मानवीय सुख को बढ़ावा दे। इसका अर्थ यह है कि हमें सभी विश्व धर्मों के समान गुणों पर बल देना चाहिए - मानवीय आदर्श। ये दो चरण हमें व्यक्तिगत तौर पर और एक साथ मिलकर विश्व शांति के लिए आवश्यक आध्यात्मिक परिस्थितियाँ तैयार करने के कार्य में सहायक होंगे।

                                            हम विभिन्न धर्म के अभ्यासी मिलकर विश्व शांति के लिए काम कर सकते हैं जब हम विभिन्न धर्मों को सहृदयता के विकास - दूसरों के प्रति प्यार और सम्मान, समुदाय का एक सच्चा भाव के आवश्यक उपकरणों के रूप में देखते हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण बात है धर्म के उद्देश्य की ओर देखना, न कि उसके धर्मशास्त्र और तत्व मीमांसा के विस्तृत रूप की ओर, जो कोरी बौद्धिकता की ओर ले जाता है। मेरा मानना है कि विश्व के सभी प्रमुख धर्म विश्व शांति में योगदान दे सकते हैं और मानवता के कल्याण के लिए मिलजुलकर कार्य कर सकते हैं, यदि हम सूक्ष्म आध्यात्मिक विभिन्नताओं को परे रख दें, जो कि वास्तव में प्रत्येक धर्म का आंतरिक मामला है।

                                             वैश्विक स्तर पर हुई आधुनिकता के कारण आई प्रगतिशील धर्मनिरपेक्षता और विश्व के कुछ भागों में आध्यात्मिक मूल्यों को नष्ट करने की सभी व्यवस्थित प्रयासों के बावजूद मानव जाति का एक बड़ा भाग किसी न किसी धर्म को मानता ही है। धर्म में अटूट विश्वास, जो अधार्मिक राजनीतिक प्रणाली में भी स्पष्ट है, स्पष्ट रूप से धर्म की शक्ति को प्रदर्शित करता है। इस आध्यात्मिक ऊर्जा और शक्ति का उद्देश्यपूर्ण उपयोग विश्व शांति के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ लाने में हो सकता है। इस संबंध में विश्व के सभी धर्मगुरु और मानवतावादियों की विशिष्ट भूमिका है।
                                          हम विश्व शांति को प्राप्त कर पाएँगे अथवा नहीं, पर हमारे पास उस दिशा में काम करते रहने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। यदि हमारे चित्त पर क्रोध हावी रहा है तो हम मानव बुद्धि का सबसे अच्छा अंग प्रज्ञा - उचित और अनुचित के बीच अंतर करने की क्षमता खो देंगे। क्रोध आज की दुनिया के सामने उपस्थित सबसे गंभीर समस्या है।
संस्थाओं को आकार देने में वैयक्तिक शक्ति वर्तमान संघर्षों में क्रोध की भूमिका कोई कम नहीं है, जैसे कि मध्य-पूर्व, दक्षिण पूर्व एशिया, उत्तर-दक्षिण जैसी समस्याएँ, आदि आदि। ये संघर्ष एक-दूसरे की मानवीयता को न समझ पाने के कारण जन्म लेते हैं। इसका उत्तर सैन्य शक्ति का विकास या अधिक उपयोग नहीं है और न ही हथियारों की दौड़। न ही यह विशुद्ध राजनैतिक है अथवा विशुद्ध तकनीकी। मूलत: यह आध्यात्मिक है, इस रूप से जिस बात की आवश्यकता है, वह एक आम मानवीय परिस्थिति की संवेदनशील समझ। नफरत और युद्ध किसी के लिए सुख नहीं ला सकती, यहाँ तक कि युद्ध के विजेताओं के लिए भी नहीं। हिंसा सदा दुख ही लाती है और इस प्रकार मूल रूप से प्रतिकूलात्मक है। इसलिए अब समय आ गया है कि विश्व के नेता नस्ल, संस्कृति और विचारधारा के अंतर से ऊपर उठें, सोचें और एक-दूसरे को समान मानवीय परिस्थिति के दृष्टिकोण से देखें। ऐसा करना लोगों, समुदायों, राष्ट्रों और कुल मिलाकर विश्व के लिए लाभप्रद होगा।

                                    आज के विश्व के तनाव का बड़ा भाग, ‘पूर्वी गुट’ बनाम ‘पश्चिमी गुट’ के संघर्ष, जो द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से चल रहा है, से उत्पन्न हुआ प्रतीत होता है। ये दोनों गुट एक-दूसरे की बिलकुल प्रतिकूल दृष्टिकोण से व्याख्या करते हैं और देखते हैं। यह निरंतर अनौचित्य संघर्ष एक मानव के रूप में आपसी स्नेह और सम्मान के अभाव के कारण है। पूर्वी गुट के देशों को पश्चिमी गुट के देशों के प्रति घृणा को कम करना चाहिए क्योंकि पश्चिमी गुट भी मनुष्यों से ही बना है- पुरुष, महिलाओं और बच्चे। इसी तरह से पश्चिमी गुट के देशों को भी पूर्वी गुट के देश के लोगों के प्रति घृणा भाव कम करना होगा, क्योंकि पूर्वी गुट में भी मनुष्य ही हैं। इस परस्पर घृणाभाव को कम करने में दोनों गुटों के नेताओं की अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका है। परन्तु सबसे पहले और सबसे प्रमुख, नेताओं को अपनी स्वयं की और दूसरों की मानवीयता का अनुभव करना होगा। इस मूलभूत अनुभूति के बिना सुसंगठित घृणा को प्रभावी तरीके से कम करने की प्राप्ति बहुत कम होगी।

                                 उदाहरण के लिए, यदि संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के नेता अचानक किसी निर्जीव द्वीप पर मिलें तो मुझे विश्वास है कि वे एक-दूसरे से सहजता से साधारण मनुष्यों की ही तरह मिलेंगे। पर जैसे ही उनकी पहचान अमेरिका के राष्ट्रपति और सोवियत संघ के प्रमुख के तौर पर होती है, परस्पर संदेह और गलतफहमी की दीवार दोनों को अलग कर देती है। बिना किसी कार्यसूची के अनौपचारिक लंबी भेंट के रूप में अधिक मानवीय संपर्क उनकी आपसी समझ को सुधारेगा, वे एक-दूसरे को मनुष्य के तौर पर समझना सीखेंगे और इसी समझ के आधार पर अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं को फिर सुलझाने का प्रयास करेंगे। कोई भी दो गुट, विशेषकर जिनका इतिहास शत्रुता से भरा हो, आपसी संदेह और घृणा के वातावरण में लाभदायक बातचीत नहीं कर सकते।

                                मेरा सुझाव है कि विश्व के नेताओं को वर्ष में एक बार किसी सुंदर स्थान पर बिना किसी काम के मिलना चाहिए, केवल एक दूसरे को मनुष्य के तौर पर समझने के लिए। फिर बाद में वे परस्पर और वैश्विक समस्याओं पर चर्चा के लिए भेंट कर सकते हैं। मुझे विश्वास है कि अन्य लोग भी मेरी इच्छा से सहमति रखते हैं कि विश्व के नेताओं को सम्मेलन में एक-दूसरे की मानवीयता को लेकर परस्पर सम्मान और समझ के वातावरण में मिलना चाहिए ।

                                    समूचे विश्व में व्यक्ति के व्यक्ति से संपर्क को सुधारने के लिए मैं अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन को और अधिक बढ़ावा मिलता देखना चाहूँगा। साथ ही पत्र-पत्रिकाएँ, विशेषकर लोकतांत्रिक समाजों में मानवीयता की परम एकता को दर्शाने वाली मानवीय दिलचस्पी की घटनाओं को प्रकाशित कर विश्व शांति में उल्लेखनीय योगदान दे सकती है। अंतरराष्ट्रीय अखाड़े में कुछ बड़ी शक्तियों के उभरकर सामने आने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की मानवीय भूमिका को परे रखकर उसे उपेक्षित किया जा रहा है। मैं आशा करता हूँ कि इसे सुधारा जाएगा और सभी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं, विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र, मानवता के अधिकाधिक लाभ को सुनिश्चित करते हुए अंतरराष्ट्रीय समझ को बढ़ाने में अधिक सक्रिय और प्रभावी भूमिका निभाएगा। यह अत्यंत दुखदपूर्ण होगा यदि कुछ शक्तिशाली सदस्य अपने एकतरफा हित साधने के लिए संयुक्त राष्ट्र जैसी विश्व संस्था का दुरुपयोग करना जारी रखें। संयुक्त राष्ट्र को विश्व शांति का साधन बनना चाहिए। यह विश्व संस्था सभी के द्वारा सम्मानित की जानी चाहिए क्योंकि संयुक्त राष्ट्र सभी छोटे दमित देशों की आशाओं का एकमात्र स्रोत है और इस तरह से समूचे ग्रह का।

विश्व शांति को लेकर मानवीय दृष्टिकोण -2


                           

               विश्व शांति को लेकर मानवीय दृष्टिकोण

                              चूँकि सभी राष्ट्र आर्थिक रूप से एक दूसरे पर आश्रित हैं अतः प्रत्येक देश में हर व्यक्ति को सुख का अधिकार दिया जाना चाहिए और राष्ट्रों के बीच छोटे से छोटे राष्ट्रों के कल्याण के लिए भी एक समान चिंता होनी चाहिए। मैं यह सुझाव नहीं दे रहा कि एक व्यवस्था दूसरे से बेहतर है और सभी को उसे अपनाना चाहिए। इसके विपरीत, राजनैतिक प्रणालियों और विचारधाराओं में विविधता अच्छी है और साथ ही मानवीय समाज में स्वभाव की विविधता के साथ मेल खाती है। यह विविधता मानव की सुख प्राप्त करने की अंतहीन खोज को बढ़ाती है। इस तरह से हर एक समुदाय को आत्म-निर्णय के सिद्धांत पर आधारित होकर अपनी राजनैतिक और सामाजिक-आर्थिक प्रणाली को विकसित करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। 

                             न्याय, सौहार्द्र और शांति की प्राप्ति कई कारकों पर निर्भर करता है। हमें उनके बारे में सोचते समय अल्प अवधि के लाभ के स्थान पर मनुष्य के दीर्घ कालीन कल्याण के संदर्भ में सोचना चाहिए। मैं समझता हूँ कि हमारे समक्ष का यह कार्य कितना बड़ा है, परन्तु मैं मेरे द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव- जो कि हमारी समान मानवता पर आधारित है- के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प दिखाई नहीं देता। राष्ट्रों के पास एक-दूसरे की चिंता के अलावा कोई विकल्प नहीं है, मानवता में उनके विश्वास के कारण नहीं, बल्कि यह सभी सम्बद्धितों के परस्पर और दीर्घ अवधि के हित में है। इस नई वास्तविकता की स्वीकार्यता क्षेत्रीय या महाद्वीपीय आर्थिक संगठनों से प्रकट होती है, जैसे यूरोपिय आर्थिक समुदाय, दि एसोसियेशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशन्स इत्यादि। मैं आशा करता हूँ कि इस तरह के और अंतर्देशीय संगठन गठित किए जाएँगे, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ आर्थिक विकास और क्षेत्रीय स्थिरता की कमी प्रतीत होती है।

                              वर्तमान परिस्थितियों में मानवीय समझ और एक वैश्विक बढ़ती आवश्यकता है। इस तरह के विचारों को प्राप्त करने के लिए हमें सहृदयता और दया भरा हृदय का विकास करना होगा, क्योंकि इसके बिना हम न तो सार्वभौमिक सुख पा सकते हैं और न ही स्थायी विश्व शांति। हम कागज़ पर शांति निर्मित नहीं कर सकते। वैश्विक उत्तरदायित्व और सार्वभौमिक बंधुत्व-भगिनी भाव का समर्थन करते हुए, तथ्य यह है कि मानवता राष्ट्रीय समुदायों के तौर पर विभिन्न घटकों में नियोजित है। इस तरह वास्तविकता में मुझे लगता है कि इन्हीं समुदायों के विश्व शांति के लिए नींव के पत्थरों की तरह कार्य करना चाहिए। अतीत में अधिक न्यायपूर्ण और समान समाजों के निर्माण के प्रयास हुए हैं। असामाजिक शक्तियों से लड़ने के लिए महान उद्देश्यों वाली संस्थाएँ बनाई गई है। दुर्भाग्य से ऐसे विचारों को स्वार्थ के हाथों धोखा खाना पड़ा है। पहले की तुलना में हम आज अधिक देखते हैं कि किस तरह से नैतिकता और महान सिद्धांत स्वार्थ की छाया में धूमिल हो रहे हैं, खासतौर पर राजनैतिक क्षेत्र में। एक ऐसी विचारधारा भी है जो हमें पूरी तरह से राजनीति से ही परे रहने की चेतावनी देती है, क्योंकि राजनीति अब अनैतिकता का पर्याय बन चुकी है। नैतिकताविहीन राजनीति मानवीय कल्याण को आगे नहीं बढ़ा सकती और बिना नैतिकता के जीवन मानव को जानवर के स्तर तक ला खड़ा करता है। परन्तु राजनीति सूक्ति रूप में गंदी नहीं है। बल्कि हमारी राजनैतिक संस्कृति के उपकरणों ने मानवीय कल्याण के ऊँचे आदर्शों और महान सोच को विकृत कर दिया है। स्वाभाविक तौर पर आध्यात्मिक लोग राजनीति में धार्मिक नेताओं के घुसपैठ पर चिंता व्यक्त करते हैं, चूँकि उन्हें गंदी राजनीति द्वारा धर्म की विकृति का भय है।

                                      मैं इस लोकप्रिय सोच पर प्रश्न उठाता हूँ कि राजनीति में धर्म और नैतिकता का कोई स्थान नहीं है और यह भी कि धार्मिक व्यक्तियों को संन्यासियों की तरह समाज से दूर रहना चाहिए। धर्म को लेकर ऐसी सोच अत्यधिक, एकतरफा है और इसमें एक व्यक्ति के समाज के साथ संबंध और हमारे जीवन में धर्म की भूमिका को लेकर सही दृष्टिकोण का अभाव है। नैतिकता राजनीतिज्ञों के लिए भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि किसी धर्म अभ्यासी के लिए। अगर राजनीतिज्ञ और शासक नैतिक सिद्धांतों को भूल गए तो इसके परिणाम बहुत खतरनाक होंगे। हम ईश्वर में विश्वास करें अथवा कर्म में, नैतिकता हर धर्म का आधार है।

                                    नैतिकता, करुणा, शालीनता, प्रज्ञा आदि ऐसे मानवीय गुण हमारी सभ्यताओं की आधारशिला रहे हैं। इन गुणों को अनुकूल सामाजिक वातावरण में नियमित नैतिक शिक्षा के साथ विकसित कर बनाए रखना चाहिए ताकि एक ज्यादा मानवीय उभरे। इस प्रकार के विश्व के निर्माण हेतु आवश्यक गुणों का विकास प्रारंभ से ही किया जाना चाहिए, बचपन से। इस परिवर्तन के लिए हम अगली पीढ़ी तक की प्रतीक्षा नहीं कर सकते, वर्तमान पीढ़ी को ही मूलभूत मानवीय मूल्यों के नवीनीकरण के प्रयास करने होंगे। यदि कोई आशा है तो वह भविष्य की पीढ़ियों में है, परन्तु यदि हम विश्वस्तर पर हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति में बड़ा परिवर्तन नहीं करते तो यह संभव नहीं है। हमें सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता और उसके अभ्यास के लिए एक क्रांति की आवश्यकता है।

                                         नैतिक ह्रास को रोकने के लिए मात्र कोलाहल मचाना पर्याप्त नहीं है, हमें इस संबंध में कुछ करना होगा। चूँकि वर्तमान सरकारें इस तरह के धार्मिक उत्तरदायित्व नहीं उठाती, मानवतावादियों और धर्मगुरुओं को सम्प्रति स्थित नागरिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक और धार्मिक संस्थाओं को और अधिक सशक्त करना होगा ताकि मानवीय और नैतिक मूल्यों को पुनर्जीवित किया जा सके। जहाँ आवश्यक हो, हमें इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए नई संस्थाओं का निर्माण करना चाहिए। केवल ऐसा करके ही हम विश्व शांति के लिए एक स्थायी आधार के निर्माण की कल्पना कर सकते हैं।

                                          समाज में रहते हुए हमें अपने साथी नागरिकों के दुखों को बाँटना चाहिए और न केवल अपने प्रियजनों बल्कि अपने दुश्मनों के प्रति भी करुणा और सहनशीलता का अभ्यास करना चाहिए। यही हमारी नैतिक बल की परीक्षा है। हमें अपने अभ्यास से उदाहरण स्थापित करना चाहिए क्योंकि हम दूसरों को धर्म के महत्त्व के विषय में केवल शब्दों से विश्वास दिलाने की आशा नहीं कर सकते। हमें ईमानदारी और त्याग की उसी उच्च गुणवत्ता के स्तर पर रहना होगा, जिसकी हम दूसरों से अपेक्षा करते हैं। सभी धर्मों का परम उद्देश्य मानवता की सेवा और उसे लाभ पहुँचाना है। इसी कारण यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि धर्म का उपयोग सदा सभी लोगों को सुख और शांति लाने के लिए किया जाए और न कि केवल दूसरों का धर्म परिवर्तन के लिए।

                                        वैसे धर्म में कोई राष्ट्रीय सीमाएँ नहीं होती। किसी भी धर्म का उपयोग किसी भी व्यक्ति द्वारा किया जा सकता है या उसे करना चाहिए यदि उसे वह लाभकारी लगता है। प्रत्येक खोजी के लिए जो महत्त्वपूर्ण है वह यह कि वह ऐसे धर्म का चयन करे जो उसके लिए उपयुक्त हो। परन्तु किसी विशिष्ट धर्म को अपनाने का अर्थ अन्य धर्म का अथवा अपने समुदाय का परित्याग करना नहीं है। बल्कि, यह महत्त्वपूर्ण है कि जो किसी धर्म को अपनाते हैं उन्हें अपने समाज से कट नहीं जाना चाहिए, उन्हें अपने ही समाज में और उसके सदस्यों के साथ सद्भाव के साथ रहना चाहिए। अपने ही समाज से पलायन करके आप दूसरों का भला नहीं कर सकते, जबकि दूसरों का कल्याण ही वास्तव में धर्म का मूल उद्देश्य है।

                                         इस दृष्टिकोण चित्त में दो बातें रखना आवश्यक है - आत्मनिरीक्षण और आत्म सुधार। हमें निरंतर दूसरों के साथ अपने व्यवहार को लगातार परखते रहना चाहिए, स्वयं का बड़ी सावधानी से परीक्षण करना चाहिए और जब भी हम देखें कि हम गलत हैं तो हमें अपने आप को ठीक करना चाहिए।

                                      अंत में कुछ शब्द भौतिक विकास पर। मैंने पश्चिम के लोगों से भौतिक विकास के विरुद्ध बहुत शिकायतें सुनी है और फिर भी यह विरोधाभास है पाश्चात्य विश्व के लिए, यही गर्व की बात रही है। मुझे अपने आप में भौतिक विकास में कुछ भी गलत दिखाई नहीं देता, बशर्ते कि लोगों को सदा प्राथमिकता दी जाए। मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि मानवीय समस्याओं के उनके सभी रूपों में समाधान के लिए हमें आर्थिक विकास के साथ आध्यात्मिक विकास को मिलाकर समन्वय लाना होगा।

                                      परन्तु हमें इसकी सीमाओं को भी जान लेना चाहिए। यद्यपि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के रूप में भौतिक ज्ञान का मानवीय कल्याण में बहुत योगदान रहा है, परन्तु फिर भी इसमें स्थायी सुख के निर्माण की क्षमता नहीं है। उदाहरण के लिए, अमेरिका में जहाँ किसी अन्य देश की तुलना में तकनीकी विकास संभवतः सबसे उन्नत है, अभी भी बहुत अधिक मानसिक दुख है। इसका कारण है कि भौतिक ज्ञान केवल एक प्रकार का सुख दे सकता है जो कि भौतिक परिस्थितियों पर निर्भर है। यह आंतरिक विकास से उपजा बाहरी तत्वों से स्वतंत्र सुख नहीं दे सकता।

                                       मानवीय मूल्यों के नवीनीकरण और स्थायी सुख प्राप्त करने के लिए हमें विश्व भर के सभी देशों की आम मानवीय विरासत को देखना होगा। उम्मीद है कि यह लेख एक त्वरित स्मरण-पत्र की तरह काम करे इसके पहले कि हम उन मानवीय मूल्यों को भूल जाएँ जो धरती पर हम सभी को एक परिवार की तरह एक सूत्र में पिरोते हैं। 

                  मैंने उपरोक्त पंक्तियाँ अपनी अनवरत अनुभूति को बताने के लिए लिखी है।
 

जब कभी भी मैं किसी ‘विदेशी व्यक्ति’ से मिलता हू्ँ, 
मेरी अनुभूति इसी प्रकार की होती है कि मैं मानव परिवार के ही एक अन्य सदस्य से मिल रहा हूँ।
इस व्यवहार ने गहन किया है 
सभी सत्वों के प्रति मेरे प्रेम और सम्मान को
मेरी यह स्वाभाविक इच्छा
बने विश्व शांति में मेरा छोटा सा योगदान 
मैं प्रार्थना करता हूँ 
अधिक मैत्रीपूर्ण, संवेदनशील और समझवाली
मानव परिवार की 
वे सभी जो दुख नहीं चाहते
जो स्थायी खुशी का भाव संजोते हैं
मेरा हृदय से अनुभूत यही अनुरोध है।

Original artical taken from http://www.dalailamahindi.com

Tuesday, September 27, 2016

कश्मीरी जनता का भारतीय बुर्जुआ राज्यसत्ता से अलगाव का इतिहास



                               भारतीय बुर्जुआ राज्यसत्ता के जन्मकाल से ही कश्मीरी राष्ट्रीयता का उससे अलगाव होना शुरू हो गया था। बर्तानवी गुलामी से भारत के आज़ाद होने के वक़्त जम्मू एवं कश्मीर राज्य उन 562 रियासतों में से एक था जो अंग्रेजी राज्य के अधीन थे। आज़ादी मिलने के तुरन्त बाद हैदराबाद, जूनागढ़ तथा जम्मू एवं कश्मीर को छोड़कर अन्य सभी राजों-रजवाड़ों ने भारत या पाकिस्तान में से किसी एक डोमिनियन में शामिल होने का फैसला कर लिया। हैदराबाद का निज़ाम एक स्वतंत्र राष्ट्र के ख़्वाब देख रहा था जबकि जूनागढ़ का नवाब पाकिस्तान में मिलने का पक्षधर था। इन दो रियासतों में भारत का तर्क था कि उनके भविष्य का फैसला वहाँ के शासक नहीं बल्कि जनता करेगी। उन दो रियासतों की बहुसंख्यक आबादी भारत में विलय की पक्षधर थी और इसलिए वे भारत में शामिल हुए। जूनागढ़ में तो फरवरी 1948 में बाकायदे रिफरेंडम भी करवाया गया जिसमें वहाँ की जनता ने भारी बहुमत से भारत में शामिल होने के पक्ष में मत दिया। परन्तु जम्मू एवं कश्मीर में स्थिति इसके ठीक उलट थी। वहाँ की अधिकांश जनसंख्या मुस्लिम थी, परन्तु वहाँ का शासक महाराजा हरी सिंह हिन्दू था। हरी सिंह भारत या पाकिस्तान में मिलने की बजाय जम्मू एवं कश्मीर को एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाना चाहता था ताकि उसके वंश का शासन बरकरार रहे। ग़ौरतलब है कि जम्मू एवं कश्मीर राज्य को हरी सिंह के पूर्वज गुलाब सिंह ने कुख़्यात अमृतसर की संधि में अंग्रेज़ों से 75 लाख रुपये में खरीदा था। अंग्रेज़ों को डोगरा राजा गुलाब सिंह की वफ़ादारी पर पूरा भरोसा था क्योंकि वह पहले सिख शासन से दग़ाबाजी करते हुए अंग्रेजों के पाले में आ खड़ा हुआ था। भारत की आज़ादी के वक़्त जम्मू एवं कश्मीर में लगभग 77 फ़ीसदी आबादी मुस्लिम थी। यदि सिर्फ़ कश्मीर घाटी की बात की जाये तो वहाँ 94 फ़ीसदी से भी ज़्यादा आबादी मुस्लिम थी। जम्मू एवं कश्मीर में डोगरा राजाओं के शासन में अधिकांश जागीरदार और भूस्वामी हिन्दू थे जबकि आम ग़रीब किसान आबादी में मुस्लिमों की बहुतायत थी। इस प्रकार वहाँ वर्गीय ध्रुवीकरण और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण में संगति होने से बाद में वर्षों में हिन्दू एवं मुस्लिम दोनों धर्मों की कट्टरपन्थी ताक़तों को अपना आधार जमाने में मदद मिली। हालाँकि ग़ौर करने वाली बात यह भी है कि वैष्णव, शैव, सूफ़ी परम्पराओं के मिलेजुले प्रभाव की वजह से कश्मीर में इस्लाम की प्रकृति भारतीय महाद्वीप के अन्य हिस्सों से बिल्कुल अलग है। इसी वजह से कश्मीरी अवाम की लड़ाई को पाकिस्तानपरस्ती की दिशा में ले जाने की पाकिस्तान की तमाम कोशिशों के बावजूद अभी तक कश्मीरियों की आज़ादी की लड़ाई ने एक स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखा है।

                                        बर्तानवी गुलामी से भारत की आज़ादी के वक़्त कश्मीर के सबसे लोकप्रिय नेता शेख अब्दुल्ला थे। शेख अब्दुल्ला 1931 में मुस्लिम कान्फ्रेंस नामक दल से जुड़े हुए थे जो शुरू में कश्मीर में सरकारी नौकरियों में कश्मीरी मुस्लिमों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए संघर्ष करता था। परन्तु बाद में यह आन्दोलन जनवाद के लिए संघर्ष की शक़्ल अख्‍त़ियार करने लगा और डोगरा सामन्ती शासन के विरोध में कश्मीरी किसानों का आन्दोलन बनता गया। शीघ्र ही सामन्तवाद विरोधी इस जनवादी आन्दोलन को कश्मीर के गैर-मुस्लिम नेतृत्व मसलन पंडित प्रेमनाथ बजाज एवं सरदार बुद्ध सिंह के साथ ही साथ गाँधी, नेहरू, आज़ाद, खान अब्दुल ग़फ्फ़ार खान जैसे भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के नेताओं का भी समर्थन मिलने लगा। शेख अब्दुल्ला भी भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष और उसके नेताओं से प्रभावित होते गये और उन्हें इस सच्चाई का एहसास होने लगा कि आन्दोलन को व्यापक रूप देने के लिए उन्हें उसे धर्म निरपेक्ष बनाना होगा। इसीलिए शेख अब्दुल्ला ने अपनी पार्टी का नाम मुस्लिम कान्फ्रेंस से बदलकर नेशनल कान्फ्रेंस रखने का प्रस्ताव रखा जो 11 जून 1939 को पारित हुआ। उसी समय शेख अब्दुल्ला ने पंडित प्रेमनाथ बजाज, सरदार बुध सिंह, पंडित सुदमा सिधा, जिया लाल कीलम, कश्यप बन्धु जैसे ग़ैर-मुस्लिम प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के साथ मिलकर ‘राष्ट्रीय माँगें’ नामक मांगपत्रक का मसौदा तैयार किया जो भविष्य के ‘नया कश्मीर’ घोषणापत्र की पूर्वपीठिका थी जिसमें कश्मीर के जनता के कल्याण के लिए एक जनवादी संविधान की माँग की गयी थी। शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नेशनल कान्फ्रेंस मुस्लिम लीग और जिन्ना द्वारा प्रचारित ‘टू नेशन थियरी’ का विरोध करती थी और मज़हब के आधार पर बने मुल्क पाकिस्तान में विलय की हरगिज़ पक्षधर नहीं थी। साथ ही शेख अब्दुल्ला भारत में पूर्ण विलय को लेकर भी संशंकित थे।

                                         5 मई 1946 के एक बयान में शेख अब्दुल्ला ने सांस्कृतिक और भाषायी समरसता को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिक आधार पर भारत के राज्यों का पुनर्विभाजन करने के बाद भारत की सभी राष्ट्रीयताओं के आत्मनिर्णय के अधिकार की बात की। ग़ौरतलब है कि शेख अब्दुल्ला की यह सोच तत्कालीन भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) की लाइन से प्रभावित थी। मई 1946 में ही शेख ने महाराजा हरी सिंह के खि़लाफ़ ‘कश्मीर छोड़ो’ आन्दोलन का आग़ाज़ किया जिसके बाद उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और तीन साल की सजा हुई। परन्तु वे 16 महीने बाद 29 सितम्बर 1947 को रिहा कर दिये गये। रिहाई के फौरन बाद शेख ने बयान दिया कि ‘यदि जम्मू एवं कश्मीर में रहने वाले 40 लाख लोगों को दरकिनार कर राज्य भारत अथवा पाकिस्तान में विलय की घोषणा करता है तो मैं विद्रोह का परचम थाम लूँगा और हमें संघर्ष करना होगा’। (स्रोतः ए जी नूरानी की पुस्तक ‘दि कश्मीर डिस्प्यूट’, अनुवाद हमारा)। अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान द्वारा समर्थित कबायलियों ने कश्मीर पर हमला कर दिया जिसका सामना करने में हरीसिंह की सेना सर्वथा असमर्थ थी। यही नहीं जम्मू एवं कश्मीर के पुँछ इलाके में महाराजा की सेना में ही बग़ावत हो गयी। इसके अतिरिक्त भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद राज्य में शरणार्थियों की आवाजाही की वजह से भी वहाँ साम्प्रदायिक तनाव की स्थिति पैदा हो गयी। पाकिस्तान द्वारा समर्थित कबायली हमले और पुँछ में हरी सिंह की सेना में बग़ावत ने एक स्वतंत्र राज्य का शासक बने रहने की उसकी सारी महत्वकांक्षाओं पर पानी फेर दिया और उस हमले का मुक़ाबला करने के लिए उसे मजबूरन भारतीय सेना से मदद की गुहार करनी पड़ी। भारत ने इस सैन्य मदद की एवज़ में हरी सिंह से जम्मू एवं कश्मीर के भारत में विलय के दस्तावेज़ पर दस्तख़त करवा लिये। परन्तु यह विलय आरज़ी और सशर्त था, जैसा कि विलय के दस्तावेज़ के साथ संलग्न दस्तावेज़ो और जम्मू एवं कश्मीर पर भारत सरकार के श्वेत पत्र में स्पष्ट तौर पर उल्लिखित था। 1948 में जारी इस श्वेत पत्र में भारत सरकार ने स्पष्ट तौर पर लिखा थाः ‘जैसे ही कश्मीर में कानून और व्यवस्था क़ायम हो जायेगी और उसकी ज़मीन से आक्रमणकारियों को खदेड़ दिया जायेगा, राज्य के विलय के फैसले के बारे में वहाँ की जनता से निर्देश लिया जायेगा।’ (स्रोतः ए जी नूरानी की पुस्तक ‘दि कश्मीर डिस्प्यूट’, अनुवाद हमारा)

                                       1947 से ही भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अनेक अवसरों पर इस बात को ज़ोर देते हुए कहा कि जम्मू एवं कश्मीर के भारत में विलय के बारे में अन्तिम फैसला वहाँ की जनता करेगी और वहाँ की जनता की मर्ज़ी के बग़ैर उसको भारत में मिलाने की उनकी कोई मंशा नहीं है। कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्रसंघ में ले जाने के पहले ही नेहरू वहाँ जनमतसंग्रह कराने की बात सार्वजनिक रूप से कह चुके थे। कश्मीर में पाकिस्तान द्वारा समर्थित कबायली हमले के बाद भारत सरकार ने यह मसला संयुक्त राष्ट्रसंघ में रखा। 20 जनवरी 1948 को संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव संख्या 39 पारित किया जिसमें इस मसले की तथ्यों के आधार पर जाँच करने के मक़सद से एक आयोग बनाने की बात की गयी। इसके बाद 21 अप्रैल 1948 को सुरक्षा परिषद ने एक अन्य प्रस्ताव (प्रस्ताव संख्या 47) पारित किया जिसमें जम्मू एवं कश्मीर के भारत अथवा पाकिस्तान में विलय को वहाँ एक मुक्त और निष्पक्ष जनमतसंग्रह के द्वारा कराने की बात कही गयी थी। 1953 तक भारत कश्मीर में जनमतसंग्रह की बात करता रहा, लेकिन उसके बाद वह इस वायदे से मुकर गया।

                                     अक्टूबर 1947 में कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित कबायली हमले के बाद महराजा हरीसिंह ने जम्मू एवं कश्मीर राज्य के भारत में विलय के दस्तावेज़ पर दस्तख़त करने के साथ ही साथ एक आपातकालीन प्रशासन की नियुक्ति की और इस सरकार के नेतृत्व की जिम्मेदारी शेख अब्दुल्ला को सौंपी गयी। मार्च 1948 में जम्मू एवं कश्मीर में अन्तरिम सरकार का गठन किया गया और शेख अब्दुल्ला ने औपचारिक रूप से जम्मू एवं कश्मीर के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। इस अन्तरिम सरकार की एक ज़िम्मेदारी यह थी कि वह राज्य का संविधान बनायेगी। इसके अलावा शेख अब्दुल्ला व कुछ अन्य कश्मीरियों को भारत की संविधान सभा में भी शामिल किया गया। भारत की संविधान सभा ने जो संविधान बनाया उसमें धारा 370 में जम्मू एवं कश्मीर को विशेष राज्य का दर्ज़ा गया जिसके अनुसार जम्मू एवं कश्मीर को भारतीय संघ के तहत अपना अलग संविधान बनाने का अधिकार था; जम्मू एवं कश्मीर के सन्दर्भ में भारत की संसद का अधिकार महज़ रक्षा, विदेशी मसलों एवं संचार तक सीमित था।

                                  1948 से 1953 तक जम्मू एवं कश्मीर के प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान शेख अब्दुल्ला कश्मीर के पाकिस्तान में विलय अथवा जनमतसंग्रह की बजाय उसकी स्वायत्तता के पक्षधर थे। परन्तु जम्मू में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में भारतीय जनसंघ द्वारा समर्थित प्रजा परिषद् आन्दोलन के बाद कश्मीर मसले का ज़बरदस्त साम्प्रदायिकीकरण हुआ जिसके बाद कश्मीरी अवाम का भारत से अलगाव बढ़ा और शेख अब्दुल्ला भी अपने रुख़ पर पुनर्विचार करने लगे। प्रजा परिषद आन्दोलन जम्मू के डोगरा भूस्वामियों के हितों की नुमाइन्दगी करता था जिनकी आर्थिक शक्ति में शेख अब्दुल्ला सरकार द्वारा लागू किये गये रैडिकल भूमि सुधारों के बाद ज़बरदस्त कमी आयी थी। परन्तु प्रजा परिषद् ने अपने इन वर्गीय हितों को छिपाने के लिए समूचे कश्मीर मसले को साम्प्रदायिक रंग दे दिया। इस आन्दोलन की मुख्य माँग यह थी कि जम्मू एवं कश्मीर राज्य को जम्मू, लद्दाख और कश्मीर इन तीन हिस्सों में बाँटकर जम्मू एवं लद्दाख से धारा 370 हटाकर उनका पूरी तरह भारत में विलय कर दिया जाये। जम्मू में इस आन्दोलन के बढ़ते आधार को देखकर शेख अब्दुल्ला और नेहरू दोनों सकते में आ गये। शेख अब्दुल्ला जो पहले ही कश्मीर मसले पर पटेल के साम्प्रदायिक बयानों से कश्मीर से भारत में विलय के मसले पर सशंकित हो उठे थे, प्रजा परिषद् आन्दोलन के बाद से और भी ज़्यादा सशंकित हो गये। नेहरू इस साम्प्रदायिक आन्दोलन की बढ़ती ताक़त से इसलिए भयभीत थे क्योंकि धर्म के आधार पर जम्मू को भारत में पूरी तरह मिलाने का निहितार्थ यह था कि कश्मीर घाटी पर भारत के दावे का आधार कमज़ोर हो जाता।

                              जम्मू में प्रजा परिषद् आन्दोलन के ज़ोर पकड़ने की वजह से कश्मीर मसले के साम्प्रदायिकीकरण के बाद शेख अब्दुल्ला भारतीय राज्य के भीतर स्वायत्तता की बजाय कश्मीर की आज़ादी के बारे में भी सोचने लगे थे। यही वह दौर था जब नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच रिश्तों में भी कड़वाहट पैदा होनी शुरू हुई। इसकी इन्तेहाँ तब हो गयी जब 8 अगस्त 1953 को अचानक शेख अब्दुल्ला को बख़ार्स्त कर उनको गिरफ़्तार कर लिया गया। तब से 11 वर्षों तक का अधिकांश समय उन्हें जेल में ही बिताना पड़ा। शेख अब्दुल्ला की जगह भारत ने अपने पिट्ठू बख़्शी गुलाम मोहम्मद को जम्मू एवं कश्मीर के प्रधानमंत्री पद पर बिठा दिया। उसके बाद नेहरू कश्मीर में जनमतसंग्रह के अपने वायदे से साफ़ मुकरने लगे। 6 फरवरी 1954 को कश्मीर की संविधान सभा ने कश्मीर के भारत में विलय को अविच्छिन्न क़रार दिया।

                                 1953 में शेख अब्दुल्ला सरकार की बख़ार्स्तगी और उनकी गिरफ़्तारी ने कश्मीरी अवाम और भारतीय बुर्जुआ राज्यसत्ता के बीच के अलगाव को नयी ऊचाइयों पर पहुँचाया। जम्मू एवं कश्मीर में नई दिल्ली की शह पर 1951 से ही की गयी चुनावी धाँधली ने भी कश्मीरी अवाम के अलगाव को बढ़ाने में एक अहम भूमिका निभायी। 1951 के संविधान सभा के चुनावों में 75 में से 73 सीटों पर नेशनल कान्फ्रेंस के उम्मीदवार निर्विरोध चुने गये क्योंकि विपक्षी उम्मीदवारों के नामांकन मामूली आधार पर रद्द कर दिये गये। संविधान सभा के इन्हीं चुनावों के आधार पर राज्य की विधान सभा का गठन हुआ था जिसने भारतीय संविधान की धारा 370 में जम्मू एवं कश्मीर को दिये गये विशेष दर्ज़े को तनु करने पर मोहर लगायी। उसके बाद 1957 और 1962 के चुनावों में भी धाँधली हुई जिसके आधार पर बख़्शी गुलाम मोहम्मद ने कमोबेश भारत के एजेंट के रूप में जम्मू एवं कश्मीर में सरकार चलायी। 1967 के विधान सभा चुनावों एवं 1971 के लोकसभा चुनावों में धाँधली का काम नेशनल कान्फ्रेंस के ही एक अन्य नेता जी एम सादिक़ के नेतृत्व में किया गया। 1967 के चुनावों में बड़े पैमाने पर हुई धाँधली का कश्मीर घाटी में ज़बरदस्त विरोध हुआ।

                                उधर शेख अब्दुल्ला अप्रैल 1964 में जेल से रिहा कर दिये गये थे। परन्तु अगले ही वर्ष उन्हें कोडईकनाल में नज़रबन्द कर दिया गया क्योंकि उन्होंने चीन के प्रधानमंत्री चाउ एनलाई से अल्जीयर्स में मुलाकात की थी। अन्ततः जनवरी 1968 को ही जाकर वे मुक्त हो सके। डेढ़ दशक की इस गिरफ़्तारी और नज़रबन्दी के बाद शेख अब्दुल्ला कमज़ोर पड़ चुके थे और रिहा होने के बाद वे भारत सरकार से समझौते के बारे में सोचने लगे थे। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद उन्होंने भारत सरकार के सामने पूरी तरह से घुटने टेक दिये। 1975 के इंदिरा गाँधी-शेख अब्दुल्ला समझौते के तहत उन्होंने कश्मीर की स्वायत्तता की माँग भी छोड़ दी और भारत सरकार द्वारा धारा 370 के तनुकरण को भी मंजूरी दे दी।

                                इंदिरा गान्धी और शेख अब्दुल्ला के बीच 1975 में हुए समझौते के पहले ही कश्मीर घाटी में कुछ ऐसे ग्रुप बन चुके थे जो सशस्त्र संघर्ष के ज़रिये कश्मीर की आज़ादी की बात करते थे। इस समझौते में शेख अब्दुल्ला द्वारा घुटने टेकने के बाद ऐसे ग्रुपों की ताक़त बढ़ी और कश्मीरी राष्ट्रीयता के संघर्ष के एक नये दौर की शुरुआत हुई। इस समझौते का सबसे मुखर रूप में विरोध करने वाले संगठनों में ‘जम्मू एवं कश्मीर पीपुल्स लीग’ प्रमुख था जो कश्मीर की आज़ादी की बात करता था। इसके संस्थापकों में शेख अब्दुल अजीज़, मुसादिक आदिल, बशीर अहमद टोटा, आज़म इंक़लाबी, अब्दुल हमीद वानी थे। शब्बीर शाह इस संगठन के महासचिव थे। बाद में यह संगठन भी कई फूटों का शिकार हुआ।

                          बहरहाल शेख अब्दुल्ला 1982 तक जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री बने रहे। 1982 में उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र फारूख़ अब्दुल्ला ने मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली। जुलाई 1984 में इंदिरा गान्धी ने फारूख अब्दुल्ला की सरकार को बख़ार्स्त कर दिया जिससे घाटी में एक बार फिर असन्तोष बढ़ने लगा। श्रीनगर में 72 दिनों तक कर्फ्यू लगा रहा। लेकिन 1986 में फारूख अब्दुल्ला ने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के साथ समझौता किया और वे एक बार फिर मुख्यमंत्री बने। मार्च 1987 में जम्मू एवं कश्मीर विधानसभा का चुनाव सम्पन्न हुआ जिसमें नेशनल कान्फ्रेंस और कांग्रेस ने गठबन्धन बनाया। इन चुनावों में बड़े पैमाने पर धाँधली हुई। विपक्षी मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट (एमयूएफ) की कश्मीर घाटी में ज़बरदस्त लोकप्रियता होने के बावजूद चुनावी धाँधली की वजह से उसे विधानसभा में सीटें नहीं जीत पायी। इन चुनावों में धाँधली के बाद कश्मीरी युवाओं की बड़ी आबादी को चुनावी प्रक्रिया से भरोसा उठ गया और बड़ी संख्या में युवाओं ने बन्दूकें थामी। इसके बाद से ही कश्मीर में सशस्त्र संघर्ष प्रभावी होकर सामने आया। ग़ौरतलब है कि जिन नेताओं ने बाद में आतंकवाद की राह पर जाने का फैसला किया उनमें से अधिकांशं ने 1987 के चुनावों में हिस्सा लिया था और चुनावी धाँधली की वजह से उनका मोहभंग हुआ। 1986 में गठित इस्लामिक स्टूडेंट्स लीग के चार प्रमुख सदस्यों – अब्दुल हमीद शेख, अश्फ़ाक माज़िद वानी, जावेद अहमद मीर और यासीन मलिक – जिन्हें हाजी ग्रुप कहा जाता था, ने एमयूएफ के समर्थन में चुनाव प्रचार किया था। यहाँ तक कि हिजबुल मुजाहिद्दीन का मुखिया सैयद सलाहुद्दीन जिसका असली नाम मोहम्मद यूसुफ शाह है, ने भी एमयूएफ के उम्मीदवार के रूप में 1987 के चुनाव में भागीदारी की थी।

                                   शुरुआती दौर में कश्मीर की आज़ादी के लिए सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व जम्मू एंड कश्मीर लिबरेशन फ्रण्ट (जेकेएलएफ) के हाथों में था। जेकेएलएफ की स्थापना 1978 में इंग्लैण्ड में अमानुल्ला खान ने की थी जो मक़बूल बट की कश्मीर लिबरेशन आर्मी का एक सदस्य था। मक़बूल बट भारतीय कब्जे़ में सक्रिय था और अमानुल्लाह खान पाक अधिकृत कश्मीर में। शुरफ़आती दौर में जेकेएलएफ एक धर्मनिरपेक्ष संगठन था और वह भारत और पाक दोनों द्वारा कब्ज़ा किये गये कश्मीर की आज़ादी की बात करता था। परन्तु भारतीय राज्य द्वारा बर्बर दमन के बाद जेकेएलएफ में इस्लामिक कट्टरपंथियों का दबदबा बढ़ने लगा। 11 फरवरी 1984 को मकबूल बट को तिहाड़ जेल में फाँसी दे दी गयी थी जिसके बाद से कश्मीरी युवाओं में असंतोष बढ़ रहा था। 1987 के चुनावों में भारी धाँधली के बाद कश्मीर में जो जनउभार देखने को आया उसके पीछे पिछले 40 सालों का कुशासन, आर्थिक बदहाली, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार भी प्रमुख कारण थे। 1988 में बिजली की दरों में वृद्धि के खि़लाफ़ प्रदर्शन के दमन से कश्मीर घाटी की जनता में ज़बरदस्त आक्रोश देखने को आया। उसी साल मकबूल बट की बरसी पर पुलिस ने कश्मीरी आज़ादी के समर्थकों पर अन्धाधुन्ध गोलियाँ चलायीं। दिसम्बर 1989 में कश्मीर समूची कश्मीर घाटी में बग़ावत की ज्वाला भड़क उठी। इस बग़ावत को बर्बरता से कुचलने के लिए कश्मीर में सैन्य बल विशेष अधिकार कानून (आफ्सपा) लगाकर सेना को असीमित अधिकार दे दिये गये। लेकिन 1990 तक आते-आते कश्मीर घाटी में लाखों लोग आज़ादी के नारे लगाते हुए उतर पड़े थे। यही वह दौर था जब पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में सोवियत संघ के खि़लाफ़ लड़ाई में प्रशिक्षित मुजाहिद्दीनों को कश्मीर में जेहाद के लिए भेजना शुरू किया और कश्मीर की आज़ादी के संघर्ष को इस्लामिक कट्टरपन्थी रंग देने की कुटिल चाल चली। इसी दौर में कश्मीर की छोटी सी अल्पसंख्यक कश्मीरी पण्डित आबादी के ऊपर भयंकर जुल्म ढाये गये। सैकड़ों कश्मीरी पण्डितों का नरसंहार किया गया और लाखों पण्डितों को परिवार समेत घाटी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके बाद ही संघ परिवार के फ़ासिस्टों ने कश्मीरी पण्डितों के बीच अपना आधार मज़बूत किया और कश्मीर मसले के साम्प्रदायिकीकरण करने की घृणित योजना को अमली जामा पहनाया। यही वह दौर था जब कश्मीर में हरकत-उल-मुजाहिद्दीन और लश्कर-ए-तोयबा जैसे पाकिस्तानपरस्त संगठनों का दबदबा भी बढ़ा।

                            कश्मीर घाटी में सशस्त्र जनउभार और आतंकवाद का भारतीय सेना के बर्बरतापूर्वक दमन किया। 1990 के दशक के अन्त तक कश्मीर में सशस्त्र संघर्ष और आतंकवादियों पर काफ़ी हद तक काबू पा लिया गया था। 1995 तक जेकेएलएफ के यासीन मलिक ने भारत के सामने घुटने टेक दिये और सशस्त्र संघर्ष का रास्ता छोड़ दिया। परन्तु इस प्रक्रिया में भारतीय सेना ने जिस क़दर कश्मीरी अवाम के मानवाधिकारों का धड़ल्ले से हनन किया उससे कश्मीरी अवाम के दिलों में भारत के प्रति नफ़रत की भावना अभूतपूर्व रूप से बढ़ी। कश्मीरियों के ज़ेहन में 1991 में भारतीय सेना द्वारा किये गये कुनान-पोशपोरा जैसे सामूहिक बलात्कार और यातना की घटनाओं की यादें अभी भी ताज़ा है। इसके अलावा अन्य बलात्कार काण्डों, फर्ज़ी मुठभेड़ों, गुमशुदगी की घटनाओं आदि की एक लम्बी दास्तान है। पिछले डेढ़ दशकों में कश्मीर में 60,000 से भी ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं और 700 लोग लापता हैं। हाल ही में कश्मीर में पायी गयी हज़ारों गुमनाम कश्मीरियों की सामूहिक कब्रें पायी गयी हैं। इसके अलावा पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों और भारतीय सेना के ख़ूनी खेल की वजह से कश्मीरियों में भारत से अलगाव की भावना गहराई तक जड़ जमा चुकी है।

                          21वीं सदी आते-आते भारत ने कश्मीर में आतंकवाद को काफ़ी हद तक काबू में कर लिया गया था। 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका के विश्व व्यापार केन्द्र पर आतंकी हमले के बाद अमेरिका द्वारा पाकिस्तान पर नकेल कसने की वजह से पाकिस्तान से कश्मीर में जेहाद के लिए आने वाले आतंकियों पर रोक लगी। सरकारी आँकड़ों के भी इस बात की गवाही देते हैं कि आतंकवाद की घटनाओं में ज़बरदस्त कमी आयी है। एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक पूरी घाटी में अब 1,000 आतंकवादी भी नहीं है। लेकिन अभी भी घाटी में 7 लाख से भी ज़्यादा भारतीय सैनिक और अर्द्ध सैन्य बलों के जवान डेरा डाले हुए हैं। कुख़्यात काला कानून आफ्सपा अभी तक वहाँ लागू है। वहाँ खुफिया एजेंसियाँ ऐसे काम करती हैं मानो वो किसी दुश्मन देश में काम करती हों। सेना द्वारा की गयी नृशंस हत्याओं, बलात्कारों और यातनाओं के अलावा घाटी में इतने लम्बे अरसे से इतनी बड़ी तादाद में सेना की उपस्थिति मात्र अपने आप में कश्मीरी अवाम में आतंक पैदा करती है। कश्मीरी इस सेना की उपस्थिति को भारतीय कब्ज़े की निशानी के रूप में देखते हैं।

                             हालिया वर्षों में भारतीय मीडिया ने कश्मीर मसले की ऐसी रिपोर्टिंग की है मानो आतंकवादियों पर नकेल कसने के बाद अब वहाँ अमन-चैन कायम हो गया है क्योंकि वहाँ जाने वाले पर्यटकों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है और चुनावों में भागीदारी बढ़ी है। खाते-पीते भारतीय मध्यवर्ग को यह लगने लगा था कि आख़िरकार कश्मीर समस्या का समाधान हो चुका है। लेकिन 2009 में अमरनाथ यात्रा के लिए भूमि अधिग्रहण के खि़लाफ़ हुए आन्दोलन के बाद से कश्मीरियों का संघर्ष एक नयी शक़्ल अख्‍त़ियार करता नज़रा आया। उस आन्दोलन में काफ़ी समय बाद ‘भारत वापस जाओ’ के नारों से समूची कश्मीर घाटी गूँज उठी। चूँकि यह एक शान्तिपूर्ण नागरिक प्रतिरोध था, इसलिए भारतीय सेना के लिए इसका बर्बर दमन करना आसान न था। अब जो कश्मीरी नौजवान सड़कों पर उतर रहे थे उनके हाथों में एके 47 या हैंड ग्रेनेड नहीं होते बल्कि पत्थर होते हैं। वे हिजबुल मुजाहिद्दीन या लश्करे तोयबा के दुर्दान्त आतंकवादी नहीं बल्कि इनमें स्कूल जाने वाले किशोर, बेरोज़गार नौजवान, प्रौढ़ और अधेढ़ महिलायें और आम जनता शामिल थी जो भारतीय सेना के दमन और उत्पीड़न के खि़लाफ़ सड़कों पर उतरे थे। अमरनाथ यात्रा विवाद के बाद शोपियाँ में दो महिलाओं के साथ सशस्त्र बलों द्वारा बलात्कार और हत्या, माछिल फर्जी मुठभेड़ में हत्या और जुलाई 2010 में तुफैल मुट्टू नामक 17 वर्षीय किशोर की सेना की गोलीबारी में मौत के बाद हुआ पूरी कश्मीर घाटी में व्यापक जनउभार देखने को आया जिसे इन्तिफ़ादा या जनविद्रोह की भी संज्ञा दी गयी जिसमें सैन्य बल की गोलियों से सौ से ज़्यादा युवाओं, किशोरों और बच्चों की जानें गयीं।

                            कश्मीरी अवाम की आकांक्षाएँ और उनका भविष्य
                                 पिछले 67 सालों के भारतीय बुर्जुआ राज्यसत्ता के दमन, उत्पीड़न और वायदाखि़लाफ़ी की वजह से कश्मीरी अवाम का भारत से अलगाव बढ़ा है और उसमें आज़ादी की आकांक्षा कम होने की बजाय बढ़ी ही है। लेकिन यह भी सच है कि निकट भविष्य में इस आकांक्षा के पूरा होने के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे। इस समय कश्मीरी अवाम की आज़ादी की आकांक्षा की सबसे मुखर रूप से पैरोकारी ऑल पार्टी हुर्रियत कान्फ्रेंस कर रही है। लेकिन हुर्रियत के सबसे रैडिकल धड़े का नेतृत्व कर रहे सैयद अली शाह गिलानी कश्मीर की आज़ादी के नाम पर उसको मज़हब के नाम पर बने राष्ट्र पाकिस्तान में मिलाना चाहते हैं। गिलानी बड़ी ही चालाकी से कश्मीर को इस्लामिक राज्य बनाने की अपनी योजना को जानबूझकर अस्पष्ट बनाये रखते हैं ताकि कश्मीरी अवाम, जो ऐतिहासिक रूप से इस्लाम की सूफ़ी धारा से प्रभावित है, उनको पाकिस्तानपरस्त नेता की बजाय कश्मीर की आज़ादी का रहनुमा ही समझती रहे। लेकिन उनके सिपाहसलार मसर्रत आलम और आसिया अन्द्राबी की खुले रूप से इस्लामिक कट्टरपन्थी हरकतों से गिलानी की मंशा साफ़ हो जाती है। यदि आज कश्मीरी अवाम का विचारणीय हिस्सा गिलानी को अपने प्रतिरोध का नेता मानता है तो उसकी वजह यह है कि गिलानी ने भारतीय राज्यसत्ता के दमन के खि़लाफ़ सबसे मुखर तरीके से विरोध किया है और अभी तक भारतीय राज्यसत्ता के सामने घुटने नहीं टेके हैं। लेकिन वे भारतीय राज्यसत्ता के सामने जितने कठोर दिखायी देते हैं, पाकिस्तानी शासकों के प्रति उनका रूख़ उतना ही नरम दिखायी देता है। पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में पाकिस्तान के दमन और उत्पीड़न के खि़लाफ़ वे चूँ तक नहीं करते। साथ ही वे इस बात पर गोलमटोल जवाब देते हैं कि जम्मू एवं कश्मीर में इस्लामिक राज्य स्थापित होने पर जम्मू के हिन्दुओं, लद्दाख के बौद्धों एवं गुज्जर व बकरवाल जैसे नृजातीय समूहों का भविष्य क्या होगा। कश्मीरी पण्डितों के घाटी में पुनर्वास पर भी उनकी कोई ठोस नीति नहीं है। ज़ाहिरा तौर पर इस प्रकार का संकीर्ण नेतृत्व कश्मीरियों के न्यायपूर्ण संघर्ष को अन्तिम विश्लेषण में कमज़ोर ही करता है। परन्तु धर्मनिरपेक्ष बुर्जुआ नेतृत्व की समझौतापरस्ती के चलते आज कश्मीर में जो विकल्पहीनता की स्थिति बनी है उसी का लाभ गिलानी जैसे इस्लामिक कट्टरपंथियों को मिल रहा है। लेकिन कश्मीर की जनता से गिलानी जैसे इस्लामिक कट्टरपंथियों की आज़ादी के नाम पर पाकिस्तानपरस्ती बहुत ज़्यादा दिन तक नहीं छिप सकती। कश्मीर में बाढ़ की त्रासदी के बाद वहाँ की आम ग़रीब जनता ने भारतीय राज्य के भेदभावपूर्ण आचरण के साथ ही साथ तथाकथित अलगाववादी नेताओं की उनसे दूरी भी देखी है। कश्मीरियों की जो ग़रीब आबादी भारी पैमाने पर बाढ़ के बाद बेघर हुई है उनको अब अस्थायी पुनर्वास केन्द्रों से निकाल बाहर किया जा रहा है और ये कश्मीरियों के रहनुमा होने का दावा करने वाले ये नेता भी उनको पूछने नहीं आ रहे हैं। ये नेता भी भारतीय सेना की ही तरह राहत कार्यों के नाम पर मीडिया में फोटो खिंचवाने से अलग हटकर जनता के दुखों-तकलीफों से जुड़ने में असमर्थ रहे।

                            आज के दौर में दुनिया भर में राष्ट्रीयताओं की लड़ाई कमज़ोर हुई है। दुनिया के किसी भी हिस्से में आज बुर्जुआ वर्ग इतना रैडिकल नहीं रह गया है कि राष्ट्रीयताओं के आत्मनिर्णय की लड़ाई में जीत हासिल कर सके। कश्मीर में भी भारत जैसे ताक़तवर बुर्जुआ राज्यसत्ता से कश्मीरी बुर्जुआ वर्ग के नेतृत्व में आत्मनिर्णय की लड़ाई में जीत हासिल करना संभव नहीं जान पड़ता। कश्मीरी बुर्जुआ वर्ग का एक बड़ा हिस्सा इस लड़ाई के दौरान ही भारतीय बुर्जुआ वर्ग द्वारा सहयोजित कर लिया गया। निम्न बुर्जुआ वर्ग का जो हिस्सा आज कश्मीर की जनता के संघर्ष का नेतृत्व कर रहा है वह भी इस्लामिक कट्टरपन्थ के पंककुण्ड में कूद पड़ने की अपनी इच्छा के चलते इस लड़ाई को कमज़ोर ही कर रहा है। लेकिन भारतीय बुर्जुआ राज्यसत्ता के दमन और उत्पीड़न की वजह से कश्मीर की जनता में अलगाव आगे भी बढ़ेगा। नरेन्द्र मोदी सरकार की साम्प्रदायिक फ़ासिस्ट सरकार की नीतियाँ आने वाले दिनों में कश्मीरियों के भारत से अलगाव को और ज़्यादा बढ़ायेगी। भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों की बुर्जुआ राजनीति में जिस तरीके से कश्मीर का प्रश्न राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है और जिस तरीके से दोनों देशों का तेज़ी से सैन्यकरण हो रहा है, ऐसे में बुर्जुआ व्यवस्था के दायरे में कश्मीर समस्या का कोई समाधान नज़र नहीं आता। इस जटिल समस्या का समाधान तो भारत में सर्वहारा क्रान्ति के बाद समाजवादी सरकार ही कर सकती है जो कश्मीर सहित सभी दमित और उत्पीड़न राष्ट्रीयताओं को आत्मनिर्णय के अधिकार के साथ एक समाजवादी संघ में शामिल होने के लिए उनके जनमानस को तैयार करेगी। परन्तु इसके लिए हमें सर्वहारा क्रान्ति आने तक इन्तज़ार नहीं करना चाहिए। सर्वहारा क्रान्ति के लिए संघर्षरत सभी लोगों को आज से ही कश्मीरी जनता के संघर्षों से एकता क़ायम करने की कोशिश करनी होगी और उनके बीच इस बात की पैठ बनानी होगी कि उनको आत्मनिर्णय का अधिकार एक सच्चे अर्थों में समाजवादी सत्ता ही दे सकती है। यानी कश्मीर सहित सभी राष्ट्रीयताओं के संघर्ष को भारत में सर्वहारा के संघर्ष से जोड़कर ही इस समस्या के वास्तविक समाधान की ओर बढ़ा जा सकता है।