संभव है कि मेरी किसी बात से आपको झटका लगे. आपकी आलोचनाओं का मैं स्वागत करूंगा, लेकिन वह स्वस्थ होनी चाहिए. यदि आप मेरे लेखन में कोई तथ्यात्मक भूल बताने कि कृपा करेंगे, तो मैं उसे तत्काल सुधार लूँगा. लेकिन अपने विचारों और निष्कर्षों को बदलने के लिए तब तक तैयार नहीं हूँ, जब तक वैसा करने का कोई पर्याप्त कारण न हो.
Tuesday, December 1, 2015
धर्म और विज्ञान
धर्म और विज्ञान एक दूसरे के विरोधी हैं , ऐसा माना जाता है। लेकिन इतिहास बताता है कि अब तक सभी संस्कृतियां विज्ञान और धर्म के दो प्रमुख स्त्रोतों पर ही अपने विकास के लिए निर्भर रही हैं। इन्हीं दो स्त्रोतों के सहारे उसने अपनी बौद्धिक तथा नैतिक शक्तियां प्राप्त की हैं। लेकिन अब यह सवाल उठने लगा है कि संपूर्ण मानव जाति के सुख के लिए जो धर्म और विज्ञान परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर थे , क्या वे आज भी मानव को सुख और शांति के मार्ग पर आगे ले जा रहे हैं ? क्या हम आज अपनी स्थिति से संतुष्ट है ? भविष्य के प्रति आशावादी हैं ? आज हमारी स्थिति इसलिए चिंताजनक है , क्योंकि विकास के हमारे मापदंड ही बदलते जमाने में गलत होते गए। धर्म और विज्ञान एक-दूसरे से अलग हुए। धर्म एक तरफ अंधविश्वासों और कर्मकांडों के जंजाल में फंस कर रह गया , तो विज्ञान ने निरी भौतिकता को ही विकास का आधार बना लिया। भारत ने ही नहीं , दुनिया के सभी देशों ने पिछले 50-55 वर्षों में विज्ञान के सहारे भौतिक उन्नति हासिल की है। विकास के इस दौर में विकसित , विकासशील और अविकसित की जो परिभाषा तय की गई , उसका मूल आधार केवल भौतिक था। संपत्ति और साधन ही मूलत: विकास का पैमाना बने। विकसित , विकासशील और अविकसित की जो परिभाषा तय की गई उसका मूल आधार केवल भौतिक था। अपने को विकसित साबित करने के लिए सभी देश भौतिक समृद्धि के पीछे पड़े रहे। लेकिन सिर्फ साधनों से विकास संभव नहीं हो सकता। भौतिक समृद्धि विकास का एक पहलू है। यह तो अब नितांत विज्ञानवादी भी मानने लगे हैं। इसकी कई वजहें हैं। प्रमुख वजह यह है कि विज्ञान के सहारे की गई प्रगति विकास के साथ विनाश भी ले आई। इसे देख कर सहमी मानवता ने माना कि इंसान के भौतिक विकास में नैतिकता की कमी रह गई है। इसलिए वह एकांगी हो गया है। इंसान केवल भौतिक जीव कदापि नहीं है , बल्कि जैसा हमने पढ़ा-लिखा-समझा है , वह केवल सामाजिक प्राणी भी नहीं है। इन दो बातों से बढ़ कर उसके व्यक्तित्व का एक और महत्वपूर्ण पहलू है। मनुष्य एक आध्यात्मिक प्राणि भी है। उसकी आध्यात्मिकता ही उसे नैतिक मार्ग पर चलने के लिए बाध्य करती है। इसीलिए , भौतिक संपन्नता और सामाजिक प्रतिष्ठा पाने के बाद भी जब तक वह आध्यात्मिकता का दामन पकड़ नहीं लेता तब तक अपने को पूर्ण महसूस नहीं करता। विकास की दौड़ में उसके व्यक्तित्व के इस महत्वपूर्ण पहलू पर कभी गौर नहीं किया गया। विज्ञान के जरिए उसने जो भी विकास हासिल किया , वह कोरा भौतिक विकास रहा। आध्यात्मिकता के अभाव में विज्ञान के सहारे की गई विध्वंसक उन्नति एकांगी और कभी-कभी विध्वंसक साबित हुई। परमाणु बम इसका उदाहरण है। मानव कल्याण के लिए निर्मित विज्ञान का यह विनाशकारी रूप देखने के बाद ही उसकी भौतिकता को नैतिक अनुष्ठान की जरूरत महसूस की गई। अब तक विकास के नाम पर जितने भी उपाय किए गए हैं , उनका एक ही उद्देश्य रहा है- अधिक से अधिक उत्पादन। कृषि के क्षेत्र में इसका उदाहरण है हरित क्रांति। उत्पादन वृद्धि के लिए बड़े जोर-शोर के साथ लागू की गई हरित क्रांति ने कुछ समय तक चुंधिया देने वाले नतीजे दिए। लेकिन आज उसका विनाशकारी रूप भी हमारे सामने आ गया है। रिकॉर्ड तोड़ उत्पादन लेने के लिए जिन रासायनिक खादों का प्रयोग किया गया , उनकी वजह से आज हमारी भूमि बंजर हो गई है। इसीलिए संपन्नता के बावजूद आज इंसान को अपनी दिशाहीनता का अहसास हो रहा है। जिस सुखी और वैभवशाली समाज का सपना लेकर वह आगे बढ़ा था , वह ऐसा नहीं था। तब सुखी समाज के निर्माण के लिए एक विचार आगे आया कि विकास के लिए केवल भौतिक ही नहीं , आध्यात्मिक पहलुओं पर भी गौर करना चाहिए। क्योंकि धर्म के पास ही विवेक और नैतिकता के वे आधार हैं जिनके सहारे विज्ञान की घोर भौतिकता पर विजय पाई जा सकती है। इसी विचार ने जन्म दिया है ' साइंस , रिलीजन एंड डेवलपमेंट ' नाम की हमारी परियोजना को , जिसका उद्देश्य है विज्ञान और धर्म के अच्छे तत्वों के सहारे एक सुखी समाज का निर्माण करना। विज्ञान और धर्म मिल कर विश्व के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इनके आधार से बनी नई दुनिया में प्रमुख तत्व होंगे परोपकार और सहकारिता। असल में समाज के निर्माण में हर इंसान की भूमिका और योगदान हो , इसलिए शिक्षा के आधार इंसान की क्षमताओं को बढ़ाने वाले होने चाहिए। तकनीकी , कला-कौशल , सामाजिक , नैतिक और आध्यात्मिक क्षमताओं को बढ़ाने वाली शिक्षा से हर इंसान का जीवन अर्थपूर्ण हो सकता है जो आगे चल कर सकारात्मक सामाजिक बदलाव ला सकता है।
(प्रस्तुति: संध्या पेडणेकर)
Location:
Nangloi Delhi, India
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