Wednesday, February 3, 2016

सरदार बल्लभ भाई पटेल की बजह से राष्ट्रपति बने थे बाबू राजेंद्र प्रसाद

        सरदार बल्लभ भाई पटेल की बजह से राष्ट्रपति बने थे बाबू राजेंद्र प्रसाद

यदि सरदार बल्लभ भाई पटेल ने जिद्द नहीं की होती तो ‘रणछोड़’ राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रपति पद के लिए तैयार ही नहीं होते।उससे पहले जवाहर लाल नेहरू ने डा.राजेंद्र प्रसाद से यह लिखवा लिया था कि वे इस सर्वोच्च संवैधानिक पद के उम्मीदवार ही नहीं हैं।राजेंद्र बाबू के देश के प्रथम राष्ट्रपति बनने से बिहार का भी मान बढ़ा था।यह थी गुजराती सरदार की बिहार को एक देन। कृतज्ञ बिहार उनके जन्म दिन पर अन्य बाबतों के साथ- साथ इस रूप में भी आजादी की लड़ाई के महान सरदार को याद करता है।
आजादी की लड़ाई के दिनों में भी सरदार पटेल जवाहर लाल नेहरू में मतभेद रहे थे।पर गांधी जी की विशाल छत्र छाया में एक साथ न जाने कितने तरह के विचार व मन मिजाज के लोग पल रहे थे।पर आजादी के तत्काल बाद से ही राजेन बाबू और नेहरू जी में मतभेद उभर कर सामने आ गए।उसमें भी एक महत्वपूर्ण सकारात्मक पात्र की भूमिका सरदार साहब ने निभाई थी।
सन 1950 में संविधान लागू हो जाने के बाद सवाल राष्ट्रपति के पद पर नियुक्ति का था।जवाहर लाल नेहरू चाहते थे कि इस पद पर राज गोपालचारी बैठें।वे तब गवर्नर जनरल भी थे।हालांकि वे विचारों से घोर दक्षिणपंथी व पूंजीवादी व्यवस्था के घनघोर पोषक थे,पर उनकी कार्य शैली व मिलन शैली प्रभावकारी थी।राजा जी को राष्ट्रपति बनाने के सवाल पर कांग्रेस पार्टी में भारी आंतरिक मतभेद उठ खड़ा हो गया।सरदार पटेल के नेतत्व वाले गुट ने डा.राजेंद्र प्रसाद के नाम को आगे बढ़ा दिया।
इस बीच जवाहर लाल नेहरू ने एक दिन राजेन बाबू के पास जाकर उनसे यह लिखवा लिया कि वे राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार ही नहीं हैं।जब इस बात का पता सरदार पटेल को चला तो वे नाराज हो गये।समकालीन नेताओं के संस्मरण लेखों व डायरी के पन्नों में दर्ज इतिहास के अनुसार उस समय की यह कहानी कुछ यूं बनती है।राजेंद बाबू से सरदार साहब ने पूछा कि आपने ऐसा लिख कर क्यों दे दिया ?इस पर ‘रणछोड’ राजेन बाबू ने कहा कि मैं गांधी जी का शिष्य हूं।यदि कोई मुझसे पूछता है कि क्या आप राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं तो यह बात मैं अपने मुंह से कैसे कह सकता हूं कि मैं उम्मीदवार हूं ? पंडित जी ने मुझसे जब ऐसा ही सवाल पूछा तो मैंने वैसा कह दिया। उनके मांगने पर मैंने यही बात लिख कर भी दे दी।
इस बिगड़ी बात को सरदार साहब ने अपने विशेष प्रयास व कौशल से बाद में संभाला।पहले तो राजेंद्र बाबू को इस बात के लिए तैयार कराया गया कि वे उम्मीदवार बनें।दरअसल राजेंद्र बाबू मन ही मन चाहते तो थे ही कि उन्हें राष्ट्रपति पद मिले,पर इसके लिए वे आज के अधिकतर नेताओं की तरह आग्रही या फिर दुराग्रही कत्तई नहीं थे।वे किसी भी पद के लिए नीचे नहीं गिरना चाहते थे।दल के अंदर तनाव पैदा करके तो कत्तई नहीं।आज जब एक चुनावी टिकट के लिए निकट का रिश्तेदार भी अपने परिजन की इज्जत की टोपी खुलेआम उछालने में तनिक भी देर नहीं लगा रहा है तो सरदार साहब के साथ -साथ राजेंद्र बाबू जैसे नेता भी कुछ अधिक ही याद आते हैं।
इस तरह जब सरदार साहब ने राजेंद्र बाबू को राष्ट्रपति पद पर बिठाने की जरूरत बताई तो तब जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के सामने यह धमकी दे डाली कि यदि राज गोपालाचारी राष्ट्रपति नहीं बनेंगे तो मैं नेता पद से इस्तीफा दे दूंगा। इस पर कांग्रेस के मुखर नेता डा.महावीर त्यागी ने साफ साफ यह कह दिया कि आप इस्तीफा दे दीजिए,हम नया नेता चुन लेंगे। फिर तो जवाहर लाल जी ने राजेन बाबू के नाम का विरोध नहीं किया। सेना की नौकरी छोड़ कर स्वतंत्रता सेनानी बने महावीर त्यागी बाद में केंद्रीय मंत्री भी बने थे।
याद रहे कि यदि पंडित नेहरू की चलती तो देश के राष्ट्रपति राज गोपालाचारी होते ।प्रधान मंत्री वे खुद थे ही । और उप राष्ट्रपति होते डा.एस.राधा कष्णन जो हुए भी। यानी तीनों पदों पर एक ही जाति के नेता बैठते। ऐसा करना पटेल गुट को कत्तई मंजूर नहीं था जबकि राजा जी महात्मा गांधी के समधी भी थे। सरदार पटेल गांधी जी के कितने करीबी थे,यह सब जानते थे। दरअसल सरदार पटेल देश की राजनीति को एक ही समुदाय के जिम्मे नहीं करना चाहते थे। वे उस समय की स्थिति के अनुसार भी समावेशी राजनीति के पक्षधर थे। राजा जी के खिलाफ यह एक सबसे बड़ी शिकायत थी कि उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया था। कांग्रेस के अन्य अनेक नेता गण भी राजा जी की उम्मीदवारी के खिलाफ थे। पर पता नहीं जवाहर लाल जी राजा जी के पक्ष में क्यों थे ! याद रहे कि राजा जी बाद में कांग्रेस में रहे भी नहीं।
सन 1942 के आंदोलन को याद करें। एक तरफ गांधी के ‘करो या मरो’ के आहवान पर सम्पूर्ण कांग्रेस पार्टी व देश आंदोलित था,वैसे समय में राजा जी उस आंदोलन के खिलाफ उठ खड़े हुए थे।इसके बावजूद राजा जी ने यह उम्मीद लगा रखी थी कि जवाहर लाल उनके लिए अपनी लोकप्रियता को भी दांव पर लगा देंगे।याद रहे कि उस समय जवाहर लाल जी देश के हदय सम्राट थे।पार्टी या फिर मंत्रिमंडल के अंदर वे अपनी बात मजबूती से जरूर कहते थे,पर यदि किसी बात पर उनका भारी विरोध हो जाता था तो नेहरू जी अपनी जिदद छोड़ भी देते थे। ऐसा उनकी लोकतांत्रिक व दल में समन्वयवादी मनोवति के कारण होता था।
पर राजा जी इस घटना के बाद कांग्रेस से निराश व नेहरू जी से नाराज हो गये। उन्होंने 1960 में स्वतंत्र पार्टी बनाई। उसमें देश भर के अनेक राजे महाराजे व व्यापारी शामिल भी हो गये।स्वतंत्र पार्टी स्वतंत्र व्यापार की पक्षधर व लाइसेंस व कोटा परमिट राज के खिलाफ थी।स्वतंत्र पार्टी का निर्माण नेहरू जी की समाजवादी नीतियों को चिढ़ाने जैसा काम था।नेहरू की नीति मिली जुली अर्थ व्यवस्था वाली थी।उनका झुकाव वाम की ओर था और वे सोवियत संघ के प्रशंसक थे। दूसरी ओर राजा जी को अमेरिकापरस्त माना जाता था।राजा जी की लगभग वही अर्थनीति थी जिस नीति पर आज सुधारीकरण के नाम पर मन मोहन सरकार चल रही है।
राजेन बाबू परंपरावादी व शुद्ध गांधीवादी थे। इतिहास बताता है कि राजेन बाबू के मामले में जवाहर लाल जी थोड़ा कठोर थे।इसका असर कामकाज व संबंधों पर झलकता रहता था।डा.राजेंद्र प्रसाद का जब पटना में निधन हुआ तब वे उनके अंतिम संस्कार में भी शामिल भी नहीं हुए।इतना ही नहीं यह संयोग नहीं लगता है कि डा.प्रसाद की जन्म भूमि जिरादेई में आज तक नेहरू परिवार के किसी सदस्य का पदार्पण नहीं हुआ है।इस आरोप को मानने का हालांकि मन नहीं करता है,पर यह आरोप भी लगाया जाता रहा है कि केंद्र सरकार ने पहली पंचवर्षीय योजना अवधि से ही बिहार की जो अन्य राज्यों के मुकाबले कम आर्थिक मदद दी ,उसका एक कारण यह भी था कि राजेंद्र बाबू इस राज्य से थे और उन्हें बिहार से ताकत मिलती थी।इस प्रकरण को ध्यान में रखने के बाद यह पता चलता है कि सरदार पटेल राजनीतिक फैसलों के मामले में कितने सही होते थे।

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