Friday, February 5, 2016

॥ नासदीय सूक्त (ऋग्वेद ) ॥

नासदीय सूक्त NAsadIya SUkta

This is the famous नासदीय सूक्त the 129-th sUkta of the 10-th mandala of the Rigveda . It has been translated and discussed by many scholars and there have been volumes dedicated to just this one sUkta . The current translation is by A . L . Basham, from his book entitled ``The Wonder that was India''.
                                नासदासीन्नोसदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमापरो यत् ।
                               किमावरीवः कुहकस्यशर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरं ॥ १ ॥
 Then even nothingness was not, nor existence,
 There was no air then, nor the heavens beyond it.
 What covered it? Where was it? In whose keeping
 Was there then cosmic water, in depths unfathomed?
अर्थ- उस समय अर्थात् सृष्टि की उत्पत्ति से पहले प्रलय दशा में असत् अर्थात् अभावात्मक तत्त्व नहीं था। सत्= भाव तत्त्व भी नहीं था, रजः=स्वर्गलोक मृत्युलोक और पाताल लोक नहीं थे, अन्तरिक्ष नहीं था और उससे परे जो कुछ है वह भी नहीं था, वह आवरण करने वाला तत्त्व कहाँ था और किसके संरक्षण में था। उस समय गहन= कठिनाई से प्रवेश करने योग्य गहरा क्या था, अर्थात् वे सब नहीं थे।
                                न मृत्युरा॑सीद॒मृतं॒ न तर्हि॒ न रात्र्या॒।आह्न॑।आअसीत्प्रके॒तः ।
                              आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्नपरः किञ्चनास ॥ २ ॥
  Then there was neither death nor immortality
  nor was there then the torch of night and day.
  The One breathed windlessly and self-sustaining.
  There was that One then, and there was no other.
अर्थ – उस प्रलय कालिक समय में मृत्यु नहीं थी और अमृत = मृत्यु का अभाव भी नहीं था। रात्री और दिन का ज्ञान भी नहीं था उस समय वह ब्रह्म तत्व ही केवल प्राण युक्त, क्रिया से शून्य और माया के साथ जुड़ा हुआ एक रूप में विद्यमान था, उस माया सहित ब्रह्म से कुछ भी नहीं था और उस से परे भी कुछ नहीं था।

                         तम॑।आअसी॒त्तम॑सा गू॒ह्ळमग्रे॑ प्रके॒तं स॑लि॒लं सर्व॑माऽइ॒दं 
                               तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकं ॥ ३ ll
 At first there was only darkness wrapped in darkness.
  All this was only unillumined water.
  That One which came to be, enclosed in nothing,
  arose at last, born of the power of heat.
अर्थ –सृष्टिके उत्पन्नहोनेसे पहले अर्थात् प्रलय अवस्था में यह जगत् अन्धकार से आच्छादित था और यह जगत् तमस रूप मूल कारण में विद्यमान था, आज्ञायमान यह सम्पूर्ण जगत् सलिल=जल रूप में था। अर्थात् उस समय कार्य और कारण दोंनों मिले हुए थे यह जगत् है वह व्यापक एवं निम्न स्तरीय अभाव रूप अज्ञान से आच्छादित था इसीलिए कारण के साथ कार्य एकरूप होकर यह जगत् ईश्वर के संकल्प और तप की महिमा से उत्पन्न हुआ।

                                         काम॒स्तदग्रे॒ सम॑वर्त॒ताधि मन॑सो॒ रेतः॑ प्रथ॒मं यदासी॑त् ।
                                         सतोबन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा ॥ ४ ॥
  In the beginning desire descended on it -
 that was the primal seed, born of the mind.
  The sages who have searched their hearts with wisdom
  know that which is is kin to that which is no
अर्थ – सृष्टि की उत्पत्ति होने के समय सब से पहले काम=अर्थात् सृष्टि रचना करने की इच्छा शक्ति उत्पन्न हुयी, जो परमेश्वर के मन मे सबसे पहला बीज रूप कारण हुआ; भौतिक रूप से विद्यमान जगत् के बन्धन-कामरूप कारण को क्रान्तदर्शी ऋषियो ने अपने ज्ञान द्वारा भाव से विलक्षण अभाव मे खोज डाला।

                        ति॒र॒श्चीनो॒ वित॑तो र॒श्मिरे॑षाम॒धः स्वि॑दा॒सी ३ दु॒परि॑स्विदासी ३ त् ।
                                     रेतोधा।आअसन्महिमान।आअसन्त्स्वधा।आवस्तात् प्रयतिः परस्तात् ॥ ५ ॥
  And they have stretched their cord across the void,
  and know what was above, and what  below.
  Seminal powers made fertile mighty forces.
  Below was strength, and over it was impulse.
अर्थ-पूर्वोक्त मन्त्रों में नासदासीत् कामस्तदग्रे मनसारेतः में अविद्या, काम-सङ्कल्प और सृष्टि बीज-कारण को सूर्य-किरणों के समान बहुत व्यापकता उनमें विद्यमान थी। यह सबसे पहले तिरछा था या मध्य में या अन्त में? क्या वह तत्त्व नीचे विद्यमान था या ऊपर विद्यमान था? वह सर्वत्र समान भाव से भाव उत्पन्न था इस प्रकार इस उत्पन्न जगत् में कुछ पदार्थ बीज रूप कर्म को धारण करने वाले जीव रूप में थे और कुछ तत्त्व आकाशादि महान रूप में प्रकृति रूप थे; स्वधा=भोग्य पदार्थ निम्नस्तर के होते हैं और भोक्ता पदार्थ उत्कृष्टता से परिपूर्ण होते हैं।

                                 को।आ॒द्धा वे॑द॒ कऽइ॒ह प्रवो॑च॒त् कुत॒।आअजा॑ता॒ कुत॑ऽइ॒यं विसृ॑ष्टिः ।
                                   अर्वाग्देवा।आस्य विसर्जनेनाथाको वेद यत।आअबभूव ॥ ६ ॥
  But,  after all, who knows, and who can say
  Whence it all came, and how creation happened?
  the gods themselves are later than creation,
  so who knows truly whence it has arisen?
अर्थ - कौन इस बात को वास्तविक रूप से जानता है और कौन इस लोक में सृष्टि के उत्पन्न होने के विवरण को बता सकता है कि यह विविध प्रकार की सृष्टि किस उपादान कारण से और किस निमित्त कारण से सब ओर से उत्पन्न हुयी। देवता भी इस विविध प्रकार की सृष्टि उत्पन्न होने से बाद के हैं अतः ये देवगण भी अपने से पहले की बात के विषय में नहीं बता सकते इसलिए कौन मनुष्य जानता है जिस कारण यह सारा संसार उत्पन्न हुआ।
                                           इ॒यं विसृ॑ष्टि॒र्यत॑।आअब॒भूव॑ यदि॑ वा द॒धे यदि॑ वा॒ न ।
                                   यो।आस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो।आङ्ग वेद यदि वा न वेद ॥ ७ ॥
  Whence all creation had its origin,
  he, whether he fashioned it or whether he did not,
  he, who surveys it all from highest heaven,
  he knows - or maybe even he does not know. 
अर्थ – यह विविध प्रकार की सृष्टि जिस प्रकार के उपादान और निमित्त कारण से उत्पन्न हुयी इस का मुख्या कारण है ईश्वर के द्वारा इसे धारण करना। इसके अतिरिक्त अन्य कोई धारण नहीं कर सकता। इस सृष्टि का जो स्वामी ईश्वर है, अपने प्रकाश या आनंद स्वरुप में प्रतिष्ठित है। हे प्रिय श्रोताओं ! वह आनंद स्वरुप परमात्मा ही इस विषय को जानता है उस के अतिरिक्त (इस सृष्टि उत्पत्ति तत्व को) कोई नहीं जानता है।

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