Wednesday, July 20, 2016

कश्मीर समस्या : इतिहास के आईने में


           कश्मीर का भारत में विलय किसी सामान्य स्थिति में नहीं हुआ था। अंग्रेज़ों की साज़िश, नेहरू के अड़ियल रुख़ और जिन्ना द्वारा साम्प्रदायिक अवस्थिति अपनाये जाने के कारण भारत का विभाजन साम्प्रदायिक आधार पर किया गया था। कश्मीर एक मुसलमान-बहुल राज्य था लेकिन वहाँ का शासन एक हिन्दू राजा के हाथ में था। कश्मीर ऐतिहासिक रूप से साम्प्रदायिकता से काफी हद तक मुक्त रहा था। कश्मीर की जनता में जिस नेता की उस समय सर्वाधिक पकड़ थी, वह थे शेख़ अब्दुल्ला। शेख़ अब्दुल्ला साम्प्रदायिक आधार पर पाकिस्तान में शामिल होने को लेकर सशंकित थे और एक इस्लामिक सिध्दान्तों पर बने राज्य में शामिल नहीं होना चाहते थे। आज़ादी के तुरन्त बाद पाकिस्तान द्वारा समर्थित कबायली हमले से शेख़ अब्दुल्ला पाकिस्तान में शामिल होने पर विचार के स्पष्ट रूप से विरोधी हो गये। लेकिन भारतीय संघ में शामिल होने को लेकर भी उनकी अपनी शंकाएँ थीं। कश्मीरी जनता बिना शर्त भारतीय संघ में शामिल होने को लेकर भी असमंजस में थी और अपनी अलग राष्ट्रीय पहचान को लेकर सचेत थी। काफी चिन्तन-मनन और राजनीतिक उथल-पुथल के बाद 1949 में कश्मीर ने सशर्त भारतीय संघ में होना स्वीकार किया। कश्मीर इस शर्त पर भारतीय संघ में शामिल हुआ कि विदेशी मसलों, सुरक्षा और मुद्रा चलन के अतिरिक्त भारतीय राज्य कश्मीर की स्वायत्तता को बरकरार रखेगा और अन्य सभी मसलों पर निर्णय लेने की शक्ति कश्मीर की सरकार के हाथ में होगी। इसके लिए भारतीय संविधान में विशेष धारा 370 को शामिल किया गया। यह इस बात का प्रावधान करती थी कि कश्मीर का मुख्यमन्त्री प्रधानमन्त्री कहलायेगा और राज्यपाल गवर्नर। कश्मीर के आन्तरिक मामलों में कश्मीर की सरकार को स्वायत्तता प्रदान की जायेगी। इस तरह से भारतीय संविधान के दायरे के भीतर कश्मीर को एक स्वायत्त राज्य के रूप में शामिल किया गया। लेकिन नेहरू को संघीयता का यह ढाँचा स्वीकार्य नहीं था। भारत और पाकिस्तान के विभाजन में अक्सर सारी ज़िम्मेदारी जिन्ना के सिर डाल दी जाती है, लेकिन कम ही लोग यह जानते हैं कि क्रिप्स मिशन के बाद जिन्ना ने अलग पाकिस्तान की माँग छोड़ने का प्रस्ताव नेहरू के सामने रखते हुए कहा था कि एक ऐसे भारतीय संघ में रहना उन्हें मंजूर है जिसमें मुस्लिम-बहुल राज्यों को सापेक्षिक स्वायत्तता हो। लेकिन एक मज़बूत केन्द्रीय राज्य मशीनरी के पक्ष में खड़े नेहरू ने इस प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया। इस मुद्दे पर नेहरू की गाँधी के साथ भी असहमति थी। पटेल और नेहरू हर कीमत पर एक मज़बूत केन्द्र चाहते थे, चाहे इसके लिए विभाजन का दंश ही क्यों न झेलना पड़े।

                कश्मीर के शामिल होने पर कश्मीरी जनता के जनमत संग्रह का भी वायदा किया गया था, जिसे कभी निभाया नहीं गया। इसके लिए नेहरू का तर्क यह था कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा 1947-48 में पाकिस्तान-समर्थित हमले के बाद यह तय किया गया था कि पाकिस्तान कश्मीर के उत्तर-पश्चिमी हिस्से से अपनी सेनाएँ वापस बुलायेगा और उसके बाद जनमत संग्रह कराया जायेगा। पाकिस्तानी शासकों ने अपना कब्ज़ा छोड़ा नहीं और इसके कारण जनमत संग्रह कराने से भारतीय शासकों ने इनकार कर दिया। लेकिन भारत और पाकिस्तान की क्षेत्रीय महत्तवाकांक्षाओं में पिस गया कश्मीरी अवाम।

                  1953 में नेहरू ने शेख़ अब्दुल्ला की चुनी हुई सरकार को बखरस्त कर दिया और शेख़ अब्दुल्ला को गिरफ्तार कर लिया और कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया। शेख़ अब्दुल्ला बीच में बाहर आये लेकिन जनमत संग्रह को लेकर उनकी अपेक्षाकृत नरम अवस्थिति अब भी नेहरू को स्वीकार नहीं थी। कुछ समय बाद उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया। 1964में शेख़ अब्दुल्ला जब रिहा हुए तब तक वे कश्मीर में जनमत संग्रह और उसकी स्वायत्तता के मसले को लेकर काफी हद तक समझौतापरस्त हो चुके थे। 1970 का दशक आते-आते धारा 370 का कोई अर्थ नहीं रह गया था। भारतीय शासक वर्ग की इस असुरक्षा भावना ने, कि अगर कश्मीर की जनता को खुला हाथ दिया गया तो वह पाकिस्तान में शामिल हो सकती है, कभी भी कश्मीर की जनता को भारत में अपनी राष्ट्रीय अस्मिता के साथ शामिल नहीं होने दिया। कश्मीर की जनता अपनी इच्छा से स्वायत्तता की शर्त के साथ भारतीय संघ में शामिल हुई थी। ऐसे में भारतीय राज्य द्वारा उसके साथ ऐसे व्यवहार को कश्मीरी जनता ने एक धोखा और विश्वासघात के रूप में लिया। यही कारण है कि आज फारुख़ अब्दुल्ला जैसे समझौतापरस्त भी 1953 तक की स्थिति को बहाल करने की माँग कर रहे हैं। क्योंकि इतनी माँग किये बग़ैर वे कश्मीरी जनता में अपना हर किस्म का आधार खो बैठेंगे। पहले ही कश्मीरी जनता का एक विचारणीय हिस्सा उन्हें ग़ुलाम बख्शी मोहम्मद जैसा ग़द्दार मानने लगा है। ग़ुलाम बख्शी मोहम्मद शेख़ अब्दुल्ला के हटाये जाने के बाद कश्मीर का मुख्यमन्त्री बना था और पूरी तरह भारतीय राज्य की कठपुतली के रूप में काम करता था।

                  भारत की पूँजीवादी सत्ता द्वारा किये गये इस ऐतिहासिक विश्वासघात ने कश्मीरी जनता में अलगाव की भावना को और अधिक बढ़ाया। जनमत संग्रह और स्वायत्ता की माँग को लेकर अलग-अलग समय पर अलग-अलग संगठनों ने कश्मीरी जनता के बीच काम किया और उन्हें संगठित किया। इस प्रकार की गतिविधियाँ जिस रफ्तार से बढ़ीं, उसी रफ्तार से भारतीय राज्य का चरित्र अधिक से अधिक दमनकारी होता गया। सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम लागू होने के बाद कश्मीर में एक सैन्य शासन जैसी स्थिति बन गयी। इस पूरे दौर में पाकिस्तान द्वारा कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा देने और धार्मिक कट्टरपन्थी आतंकवाद के बढ़ने की प्रक्रिया जारी रही। 1980 के दशक से कश्मीर में आतंकवाद एक बड़ी परिघटना के रूप में अस्तित्व में आ चुका था। इस दशक का उत्तरार्ध्द आतंकवाद की भयंकरता का उत्कर्ष था। 1989 से1991-92 के बीच ही हज़ारों कश्मीरियों ने आतंकवाद और भारतीय राज्य के बीच के टकराव की कीमत अपनी जान देकर चुकायी। धार्मिक कट्टरपन्थी आतंकवाद का कश्मीरी जनता के एक हिस्से में आधार भी तैयार हुआ। सेना द्वारा अकल्पनीय दमन, हत्या, बलात्कार और अपहरण की प्रतिक्रिया में कश्मीरी घरों के नौजवान आतंकवाद के रास्ते पर जाने लगे। भारतीय राज्य द्वारा किये गये धोखे और उसके बाद कश्मीरी जनता के भयंकर दमन ने मिलकर कश्मीरी जनता के अलगाव को नयी हदों तक बढ़ा दिया था। आज़ादी या फिर पाकिस्तान में शामिल हो जाने की बात करने वाले अलगाववादी समूहों की कश्मीरी जनता के बीच ज़बरदस्त पकड़ बन चुकी थी। लेकिन इस बात की सच्चाई यह है कि इसके लिए काफी हद तक भारतीय राज्य का विश्वासघात और सेना-दमन ज़िम्मेदार था। निश्चित रूप से इसमें सहायक योगदान पाकिस्तान द्वारा आतंकवादी और धार्मिक कट्टरपन्थी गतिविधियों को बढ़ावा देना भी था। 

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