Thursday, September 29, 2016

विश्व शांति को लेकर मानवीय दृष्टिकोण -2


                           

               विश्व शांति को लेकर मानवीय दृष्टिकोण

                              चूँकि सभी राष्ट्र आर्थिक रूप से एक दूसरे पर आश्रित हैं अतः प्रत्येक देश में हर व्यक्ति को सुख का अधिकार दिया जाना चाहिए और राष्ट्रों के बीच छोटे से छोटे राष्ट्रों के कल्याण के लिए भी एक समान चिंता होनी चाहिए। मैं यह सुझाव नहीं दे रहा कि एक व्यवस्था दूसरे से बेहतर है और सभी को उसे अपनाना चाहिए। इसके विपरीत, राजनैतिक प्रणालियों और विचारधाराओं में विविधता अच्छी है और साथ ही मानवीय समाज में स्वभाव की विविधता के साथ मेल खाती है। यह विविधता मानव की सुख प्राप्त करने की अंतहीन खोज को बढ़ाती है। इस तरह से हर एक समुदाय को आत्म-निर्णय के सिद्धांत पर आधारित होकर अपनी राजनैतिक और सामाजिक-आर्थिक प्रणाली को विकसित करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। 

                             न्याय, सौहार्द्र और शांति की प्राप्ति कई कारकों पर निर्भर करता है। हमें उनके बारे में सोचते समय अल्प अवधि के लाभ के स्थान पर मनुष्य के दीर्घ कालीन कल्याण के संदर्भ में सोचना चाहिए। मैं समझता हूँ कि हमारे समक्ष का यह कार्य कितना बड़ा है, परन्तु मैं मेरे द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव- जो कि हमारी समान मानवता पर आधारित है- के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प दिखाई नहीं देता। राष्ट्रों के पास एक-दूसरे की चिंता के अलावा कोई विकल्प नहीं है, मानवता में उनके विश्वास के कारण नहीं, बल्कि यह सभी सम्बद्धितों के परस्पर और दीर्घ अवधि के हित में है। इस नई वास्तविकता की स्वीकार्यता क्षेत्रीय या महाद्वीपीय आर्थिक संगठनों से प्रकट होती है, जैसे यूरोपिय आर्थिक समुदाय, दि एसोसियेशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशन्स इत्यादि। मैं आशा करता हूँ कि इस तरह के और अंतर्देशीय संगठन गठित किए जाएँगे, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ आर्थिक विकास और क्षेत्रीय स्थिरता की कमी प्रतीत होती है।

                              वर्तमान परिस्थितियों में मानवीय समझ और एक वैश्विक बढ़ती आवश्यकता है। इस तरह के विचारों को प्राप्त करने के लिए हमें सहृदयता और दया भरा हृदय का विकास करना होगा, क्योंकि इसके बिना हम न तो सार्वभौमिक सुख पा सकते हैं और न ही स्थायी विश्व शांति। हम कागज़ पर शांति निर्मित नहीं कर सकते। वैश्विक उत्तरदायित्व और सार्वभौमिक बंधुत्व-भगिनी भाव का समर्थन करते हुए, तथ्य यह है कि मानवता राष्ट्रीय समुदायों के तौर पर विभिन्न घटकों में नियोजित है। इस तरह वास्तविकता में मुझे लगता है कि इन्हीं समुदायों के विश्व शांति के लिए नींव के पत्थरों की तरह कार्य करना चाहिए। अतीत में अधिक न्यायपूर्ण और समान समाजों के निर्माण के प्रयास हुए हैं। असामाजिक शक्तियों से लड़ने के लिए महान उद्देश्यों वाली संस्थाएँ बनाई गई है। दुर्भाग्य से ऐसे विचारों को स्वार्थ के हाथों धोखा खाना पड़ा है। पहले की तुलना में हम आज अधिक देखते हैं कि किस तरह से नैतिकता और महान सिद्धांत स्वार्थ की छाया में धूमिल हो रहे हैं, खासतौर पर राजनैतिक क्षेत्र में। एक ऐसी विचारधारा भी है जो हमें पूरी तरह से राजनीति से ही परे रहने की चेतावनी देती है, क्योंकि राजनीति अब अनैतिकता का पर्याय बन चुकी है। नैतिकताविहीन राजनीति मानवीय कल्याण को आगे नहीं बढ़ा सकती और बिना नैतिकता के जीवन मानव को जानवर के स्तर तक ला खड़ा करता है। परन्तु राजनीति सूक्ति रूप में गंदी नहीं है। बल्कि हमारी राजनैतिक संस्कृति के उपकरणों ने मानवीय कल्याण के ऊँचे आदर्शों और महान सोच को विकृत कर दिया है। स्वाभाविक तौर पर आध्यात्मिक लोग राजनीति में धार्मिक नेताओं के घुसपैठ पर चिंता व्यक्त करते हैं, चूँकि उन्हें गंदी राजनीति द्वारा धर्म की विकृति का भय है।

                                      मैं इस लोकप्रिय सोच पर प्रश्न उठाता हूँ कि राजनीति में धर्म और नैतिकता का कोई स्थान नहीं है और यह भी कि धार्मिक व्यक्तियों को संन्यासियों की तरह समाज से दूर रहना चाहिए। धर्म को लेकर ऐसी सोच अत्यधिक, एकतरफा है और इसमें एक व्यक्ति के समाज के साथ संबंध और हमारे जीवन में धर्म की भूमिका को लेकर सही दृष्टिकोण का अभाव है। नैतिकता राजनीतिज्ञों के लिए भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि किसी धर्म अभ्यासी के लिए। अगर राजनीतिज्ञ और शासक नैतिक सिद्धांतों को भूल गए तो इसके परिणाम बहुत खतरनाक होंगे। हम ईश्वर में विश्वास करें अथवा कर्म में, नैतिकता हर धर्म का आधार है।

                                    नैतिकता, करुणा, शालीनता, प्रज्ञा आदि ऐसे मानवीय गुण हमारी सभ्यताओं की आधारशिला रहे हैं। इन गुणों को अनुकूल सामाजिक वातावरण में नियमित नैतिक शिक्षा के साथ विकसित कर बनाए रखना चाहिए ताकि एक ज्यादा मानवीय उभरे। इस प्रकार के विश्व के निर्माण हेतु आवश्यक गुणों का विकास प्रारंभ से ही किया जाना चाहिए, बचपन से। इस परिवर्तन के लिए हम अगली पीढ़ी तक की प्रतीक्षा नहीं कर सकते, वर्तमान पीढ़ी को ही मूलभूत मानवीय मूल्यों के नवीनीकरण के प्रयास करने होंगे। यदि कोई आशा है तो वह भविष्य की पीढ़ियों में है, परन्तु यदि हम विश्वस्तर पर हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति में बड़ा परिवर्तन नहीं करते तो यह संभव नहीं है। हमें सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता और उसके अभ्यास के लिए एक क्रांति की आवश्यकता है।

                                         नैतिक ह्रास को रोकने के लिए मात्र कोलाहल मचाना पर्याप्त नहीं है, हमें इस संबंध में कुछ करना होगा। चूँकि वर्तमान सरकारें इस तरह के धार्मिक उत्तरदायित्व नहीं उठाती, मानवतावादियों और धर्मगुरुओं को सम्प्रति स्थित नागरिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक और धार्मिक संस्थाओं को और अधिक सशक्त करना होगा ताकि मानवीय और नैतिक मूल्यों को पुनर्जीवित किया जा सके। जहाँ आवश्यक हो, हमें इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए नई संस्थाओं का निर्माण करना चाहिए। केवल ऐसा करके ही हम विश्व शांति के लिए एक स्थायी आधार के निर्माण की कल्पना कर सकते हैं।

                                          समाज में रहते हुए हमें अपने साथी नागरिकों के दुखों को बाँटना चाहिए और न केवल अपने प्रियजनों बल्कि अपने दुश्मनों के प्रति भी करुणा और सहनशीलता का अभ्यास करना चाहिए। यही हमारी नैतिक बल की परीक्षा है। हमें अपने अभ्यास से उदाहरण स्थापित करना चाहिए क्योंकि हम दूसरों को धर्म के महत्त्व के विषय में केवल शब्दों से विश्वास दिलाने की आशा नहीं कर सकते। हमें ईमानदारी और त्याग की उसी उच्च गुणवत्ता के स्तर पर रहना होगा, जिसकी हम दूसरों से अपेक्षा करते हैं। सभी धर्मों का परम उद्देश्य मानवता की सेवा और उसे लाभ पहुँचाना है। इसी कारण यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि धर्म का उपयोग सदा सभी लोगों को सुख और शांति लाने के लिए किया जाए और न कि केवल दूसरों का धर्म परिवर्तन के लिए।

                                        वैसे धर्म में कोई राष्ट्रीय सीमाएँ नहीं होती। किसी भी धर्म का उपयोग किसी भी व्यक्ति द्वारा किया जा सकता है या उसे करना चाहिए यदि उसे वह लाभकारी लगता है। प्रत्येक खोजी के लिए जो महत्त्वपूर्ण है वह यह कि वह ऐसे धर्म का चयन करे जो उसके लिए उपयुक्त हो। परन्तु किसी विशिष्ट धर्म को अपनाने का अर्थ अन्य धर्म का अथवा अपने समुदाय का परित्याग करना नहीं है। बल्कि, यह महत्त्वपूर्ण है कि जो किसी धर्म को अपनाते हैं उन्हें अपने समाज से कट नहीं जाना चाहिए, उन्हें अपने ही समाज में और उसके सदस्यों के साथ सद्भाव के साथ रहना चाहिए। अपने ही समाज से पलायन करके आप दूसरों का भला नहीं कर सकते, जबकि दूसरों का कल्याण ही वास्तव में धर्म का मूल उद्देश्य है।

                                         इस दृष्टिकोण चित्त में दो बातें रखना आवश्यक है - आत्मनिरीक्षण और आत्म सुधार। हमें निरंतर दूसरों के साथ अपने व्यवहार को लगातार परखते रहना चाहिए, स्वयं का बड़ी सावधानी से परीक्षण करना चाहिए और जब भी हम देखें कि हम गलत हैं तो हमें अपने आप को ठीक करना चाहिए।

                                      अंत में कुछ शब्द भौतिक विकास पर। मैंने पश्चिम के लोगों से भौतिक विकास के विरुद्ध बहुत शिकायतें सुनी है और फिर भी यह विरोधाभास है पाश्चात्य विश्व के लिए, यही गर्व की बात रही है। मुझे अपने आप में भौतिक विकास में कुछ भी गलत दिखाई नहीं देता, बशर्ते कि लोगों को सदा प्राथमिकता दी जाए। मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि मानवीय समस्याओं के उनके सभी रूपों में समाधान के लिए हमें आर्थिक विकास के साथ आध्यात्मिक विकास को मिलाकर समन्वय लाना होगा।

                                      परन्तु हमें इसकी सीमाओं को भी जान लेना चाहिए। यद्यपि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के रूप में भौतिक ज्ञान का मानवीय कल्याण में बहुत योगदान रहा है, परन्तु फिर भी इसमें स्थायी सुख के निर्माण की क्षमता नहीं है। उदाहरण के लिए, अमेरिका में जहाँ किसी अन्य देश की तुलना में तकनीकी विकास संभवतः सबसे उन्नत है, अभी भी बहुत अधिक मानसिक दुख है। इसका कारण है कि भौतिक ज्ञान केवल एक प्रकार का सुख दे सकता है जो कि भौतिक परिस्थितियों पर निर्भर है। यह आंतरिक विकास से उपजा बाहरी तत्वों से स्वतंत्र सुख नहीं दे सकता।

                                       मानवीय मूल्यों के नवीनीकरण और स्थायी सुख प्राप्त करने के लिए हमें विश्व भर के सभी देशों की आम मानवीय विरासत को देखना होगा। उम्मीद है कि यह लेख एक त्वरित स्मरण-पत्र की तरह काम करे इसके पहले कि हम उन मानवीय मूल्यों को भूल जाएँ जो धरती पर हम सभी को एक परिवार की तरह एक सूत्र में पिरोते हैं। 

                  मैंने उपरोक्त पंक्तियाँ अपनी अनवरत अनुभूति को बताने के लिए लिखी है।
 

जब कभी भी मैं किसी ‘विदेशी व्यक्ति’ से मिलता हू्ँ, 
मेरी अनुभूति इसी प्रकार की होती है कि मैं मानव परिवार के ही एक अन्य सदस्य से मिल रहा हूँ।
इस व्यवहार ने गहन किया है 
सभी सत्वों के प्रति मेरे प्रेम और सम्मान को
मेरी यह स्वाभाविक इच्छा
बने विश्व शांति में मेरा छोटा सा योगदान 
मैं प्रार्थना करता हूँ 
अधिक मैत्रीपूर्ण, संवेदनशील और समझवाली
मानव परिवार की 
वे सभी जो दुख नहीं चाहते
जो स्थायी खुशी का भाव संजोते हैं
मेरा हृदय से अनुभूत यही अनुरोध है।

Original artical taken from http://www.dalailamahindi.com

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