अगर आप केवल आध्यत्म की तरफ जा रहे हैं तो मैं कुछ नहीं बोलूँगा. अगर आप आध्यत्म के साथ दुनियां में सांसारिक कर्म में लिप्त हैं तो मन के अनेक भावों और उनके विकारों से दी हवी परिस्थतियों या वर्तमान में शायद ही हम और आप बच सके . बचने वाले तो बिरले ही होते हैं.प्रवचन तो बहुत समय से प्रचलत भी रहे हैं पर वर्तमान में वे अधिक प्रभावहीन लगते हैं. अगर प्रवचन ही आज शिक्षा और संस्कार के रूप में हमारे भावों को सर्जनशील बनाने का एक सशक्त माध्यम भी होते तो ग्रहीय भी होते. बस वे तो हमारे बाहरी दिखावे से अहम को झूठा दिलाशा देकर संतोष प्रदान करने वाले लगते हैं. आज के समय में लगभग सभी संत, गुरु और महात्माओ के मुख तो बहुत बड़ी भीड़ देखकर ही खुलते और खिलते हैं ! वे संत, गुरु, उनका सुचना तंत्र तो सब समागम के साथ पुरे सुचना तंत्र को लेकर अब तो हमारे घर में भी आ गए हैं मगर हमारा मन हैं की घर से भाग रहा हैं. करण से भी हम सहमत होंगे की घर तो बहुत बड़े हैं मगर परिवार स्वयं में सिकुड़कर फिर टूटते जा रहे हैं जिनसे हमें आदिकाल से स्वयं में झाँकने की पहली प्रेरणा मिलती रही हैं.
एक हमारा दोहरा और महीन रूप हम नहीं समझ रहेहैं . ''एक तरफ हम बाहरी दुनिया में आनंद और भोग विलास के लिए इतने खो और रम गए हैं की स्वयं को ढूढ कर पहचान ही नहीं पा रहे हैं तो दूसरी तरफ हम बाहर की तेजी से बदलती दुनियां का स्वरूप और चरित्र ही नहीं जान तथा समझ पा रहे हैं जो हमें और हमारे भावों को अन्दर जाकर बदल रही हैं.'' हमारी इस दोहरी भूमिका, चरित्र, रूप, व्यक्तित्व और कृतित्व से बेखबर रहकर हम अपने भीतर को ढूढ कर पहचानने, जानने और उसके भावों को सर्जनात्मक स्वरूप में बदलने की हिम्मत ही खोते जा रहे हैं. इसे गुधि को समझे बिना तो हमें अब ऐसा ही लगेगा की भारत के अनेक गुरु, संत, महात्मा और दर्शिन अप्रासंगिक से हो गए हैं और पश्चिम तथा लोकतान्त्रिक दुनियां के दार्शनिक आदर्श !
अब इन परिस्थतियों और अवस्था में जब दर्शन की ही बात करते हैं तो वर्तमान जमाने में यूरोपीयन दर्शन का ही बोलबाला लगता हैं और उन्हें ही जीवन में उतारने के सिधांत भी प्रतिपादित किये हैं. पूरे प्रक्रति, प्राणी और मानव सभ्यता, इतिहास, जीवन विज्ञान और मूल्यों को ही ३०० या ४०० वर्षो की खोज, अन्वेषण, अनुसन्धान और सिधान्तों के आधार पर एक रूढी, परंपरा, विशवास और आदर्श के साथ वैज्ञानिक, सभ्य, विकसित युग के नाम पर दुनिया का मानकीकरण और सरलीकरण किया जा रहा हैं. वे कहते हैं की इन जीवन मानकों को अंगीकार करके आत्मसात करो और इसी दायरे में सोचो, समझो, लिखो, कहो और रहो ! यही सभ्यता और विकास का दर्शन हैं . गाहे बगाहे पश्चिम और उनके संगी-साथी वंहा के इसी दर्शन को ब्रह्म वाक्य मान चुके हैं. हम और हमारे समाज में तो चुनोती दिखती नहीं हैं अतः हम भी इस विकास-सभ्यता के दर्शन के सम्मुख दंडवत ही दिखते हैं !
हम समझे की क्या भोगोलिक परिस्थितियों के साथ साथ जीवन मानक और प्रष्टभूमि इतनी इतनी समान रही हैं जितनी आज आरोपित करके थोपी जा रही हैं ? हमें तो इतिहास और दर्शन तो कालातीत से यही बताते रहे हैं की जीवन जटिल हैं और अनेको क्षेत्रों में हमने इसे विभिन्नता से जीया हैं .
यूरोपीयन दर्शन की बात हो और मनोविज्ञान तथा सिगमंड फ्रायड पर बात नहीं हो और उनके विचारों से सहमत ना हो तो भला सभ्य, आधुनिक और वैज्ञानिक होने के विचार भी किसी की जहमत में आ केसे सकते हैं ! बकोल फ्रायड, ''व्यक्ति की सारी क्रियाये उसकी सेक्स भावना से परिचालित होती है.'' वे ही इस मनोविज्ञानिक सिद्दांत को स्थापित करने वाले विश्व के सबसे बड़े मनोवैज्ञानिक कहलाते थे.
हम लोग कहते रहे हैं की जीवन में जिन्दा रहने के लिए खान-पान के बाद प्रजनन मुख्य क्रिया हैं. काम (सेक्स) के भावों की उत्पति, उतेजना और काम-किर्ड़ा से प्रजनन की प्रक्रिया ही सर्जनात्म्कता का मूल हैं. अन्य भावों की माया उनके इर्दगिर्द ही तो घूमती हैं. भारतीय पुरातन दर्शन और अध्यात्म इन सब से भरा पड़ा हैं. आधुनिक यूरोप शायद जीवन-दर्शन को भी टुकड़ो में देखने का आदि और अभ्यस्त हो गया लगता हैं तब तो वे भी मूल जीवन-मार्ग से भटक रहें और उनकी तरफ हम भी लालायत हैं !
जीवन-दर्शन को टुकड़ो में देखने के अभ्यस्त लोग बाद में विकास के प्रोजेक्ट आधारित कार्यों में भी लग गए जन्हा एक दुसरे का तालमेल भी नहीं बेठा ! अब एक को पकड़े तो दूसरा छूटे ! खाने और भोग-विलास के लिए झूठ और छल के आधार पर दुनिया को इतना लुटा और इकट्ठा किया हैं की अब खाए ना खुटे ! ना काम होए, ना नींद आये और ना आराम, ना आनंद. इन हालातों में काम (सेक्स) के नहीं तो उत्पन होते अब भाव ना उतेजना. ड्रग के नशे में अब वे चाहते हैं काम(सेक्स) ! फ्रायड बड़े दार्शनिक थे पर मरे किस मौत से !
एक हमारा दोहरा और महीन रूप हम नहीं समझ रहेहैं . ''एक तरफ हम बाहरी दुनिया में आनंद और भोग विलास के लिए इतने खो और रम गए हैं की स्वयं को ढूढ कर पहचान ही नहीं पा रहे हैं तो दूसरी तरफ हम बाहर की तेजी से बदलती दुनियां का स्वरूप और चरित्र ही नहीं जान तथा समझ पा रहे हैं जो हमें और हमारे भावों को अन्दर जाकर बदल रही हैं.'' हमारी इस दोहरी भूमिका, चरित्र, रूप, व्यक्तित्व और कृतित्व से बेखबर रहकर हम अपने भीतर को ढूढ कर पहचानने, जानने और उसके भावों को सर्जनात्मक स्वरूप में बदलने की हिम्मत ही खोते जा रहे हैं. इसे गुधि को समझे बिना तो हमें अब ऐसा ही लगेगा की भारत के अनेक गुरु, संत, महात्मा और दर्शिन अप्रासंगिक से हो गए हैं और पश्चिम तथा लोकतान्त्रिक दुनियां के दार्शनिक आदर्श !
अब इन परिस्थतियों और अवस्था में जब दर्शन की ही बात करते हैं तो वर्तमान जमाने में यूरोपीयन दर्शन का ही बोलबाला लगता हैं और उन्हें ही जीवन में उतारने के सिधांत भी प्रतिपादित किये हैं. पूरे प्रक्रति, प्राणी और मानव सभ्यता, इतिहास, जीवन विज्ञान और मूल्यों को ही ३०० या ४०० वर्षो की खोज, अन्वेषण, अनुसन्धान और सिधान्तों के आधार पर एक रूढी, परंपरा, विशवास और आदर्श के साथ वैज्ञानिक, सभ्य, विकसित युग के नाम पर दुनिया का मानकीकरण और सरलीकरण किया जा रहा हैं. वे कहते हैं की इन जीवन मानकों को अंगीकार करके आत्मसात करो और इसी दायरे में सोचो, समझो, लिखो, कहो और रहो ! यही सभ्यता और विकास का दर्शन हैं . गाहे बगाहे पश्चिम और उनके संगी-साथी वंहा के इसी दर्शन को ब्रह्म वाक्य मान चुके हैं. हम और हमारे समाज में तो चुनोती दिखती नहीं हैं अतः हम भी इस विकास-सभ्यता के दर्शन के सम्मुख दंडवत ही दिखते हैं !
हम समझे की क्या भोगोलिक परिस्थितियों के साथ साथ जीवन मानक और प्रष्टभूमि इतनी इतनी समान रही हैं जितनी आज आरोपित करके थोपी जा रही हैं ? हमें तो इतिहास और दर्शन तो कालातीत से यही बताते रहे हैं की जीवन जटिल हैं और अनेको क्षेत्रों में हमने इसे विभिन्नता से जीया हैं .
यूरोपीयन दर्शन की बात हो और मनोविज्ञान तथा सिगमंड फ्रायड पर बात नहीं हो और उनके विचारों से सहमत ना हो तो भला सभ्य, आधुनिक और वैज्ञानिक होने के विचार भी किसी की जहमत में आ केसे सकते हैं ! बकोल फ्रायड, ''व्यक्ति की सारी क्रियाये उसकी सेक्स भावना से परिचालित होती है.'' वे ही इस मनोविज्ञानिक सिद्दांत को स्थापित करने वाले विश्व के सबसे बड़े मनोवैज्ञानिक कहलाते थे.
हम लोग कहते रहे हैं की जीवन में जिन्दा रहने के लिए खान-पान के बाद प्रजनन मुख्य क्रिया हैं. काम (सेक्स) के भावों की उत्पति, उतेजना और काम-किर्ड़ा से प्रजनन की प्रक्रिया ही सर्जनात्म्कता का मूल हैं. अन्य भावों की माया उनके इर्दगिर्द ही तो घूमती हैं. भारतीय पुरातन दर्शन और अध्यात्म इन सब से भरा पड़ा हैं. आधुनिक यूरोप शायद जीवन-दर्शन को भी टुकड़ो में देखने का आदि और अभ्यस्त हो गया लगता हैं तब तो वे भी मूल जीवन-मार्ग से भटक रहें और उनकी तरफ हम भी लालायत हैं !
जीवन-दर्शन को टुकड़ो में देखने के अभ्यस्त लोग बाद में विकास के प्रोजेक्ट आधारित कार्यों में भी लग गए जन्हा एक दुसरे का तालमेल भी नहीं बेठा ! अब एक को पकड़े तो दूसरा छूटे ! खाने और भोग-विलास के लिए झूठ और छल के आधार पर दुनिया को इतना लुटा और इकट्ठा किया हैं की अब खाए ना खुटे ! ना काम होए, ना नींद आये और ना आराम, ना आनंद. इन हालातों में काम (सेक्स) के नहीं तो उत्पन होते अब भाव ना उतेजना. ड्रग के नशे में अब वे चाहते हैं काम(सेक्स) ! फ्रायड बड़े दार्शनिक थे पर मरे किस मौत से !
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