धर्म का कार्य है लोगों को सदाचारी और प्रेममय बनाना और राजनीति का उद्देश्य है लोगों का ध्यान रखना, उनके हित के लिए काम करना.
जब धर्म और राजनीति साथ-साथ नहीं चलते, तब हमें भ्रष्ट राजनीतिज्ञ और कपटी धार्मिक नेता मिलते हैं. एक धार्मिक व्यक्ति, जो सदाचारी और स्नेही है, अवश्य ही जनता के हित का ध्यान रखेगा और इसलिए एक सच्चा राजनीतिज्ञ बनेगा. सभी अवतार और महान उपदेशकों ने हमेशा लोक-हित का ध्यान रखा और इसलिए, राजनीति में रहे. और एक सच्चा राजनीतिज्ञ केवल सदाचारी और स्नेही ही हो सकता है, इसीलिए उसे धार्मिक होना ही है.
पूजा करने की स्वतंत्रता पर, या पूजा की विधियों पर जब धर्म बंदिश लगाता है, तब वह एक सामंजस्यपूर्ण समाज के सृजन के लिए अनुपयोगी हो जाता है. जब धर्म सब-कुछ को साथ लेकर चलता है और हर प्रकार की प्रार्थना या पूजा को पूरी स्वतंत्रता देता है, वह धर्म लोगों में सदाचार तथा शांति लाएगा तथा हर समाज के लिए उपयोगी होगा.
लोग सोचते हैं कि राजनीति और धर्म को अलग रखना चाहिए, क्योंकि कई धर्मो ने पूजा करने की स्वतंत्रता नहीं दी तथा सभी लोगों का एक समान ध्यान नहीं रखा. इतिहास बताता है कि धर्म ने झगड़े पैदा किए. परंतु अधार्मिक समाज ने अस्त-व्यस्तता एवं भ्रष्टाचार फैलाया है.
आज धर्म और राजनीति, दोनों में ही सुधार की आवश्यकता है. राजनीतिज्ञों को अधिक सदाचारी व आध्यात्मिक होना है. धर्म अधिक उदार, आध्यात्मिक व विस्तृत होकर पूजा की स्वतंत्रता दे और समस्त वि का ज्ञान उसमें व्याप्त हो. अपनत्व की भावना के बिना पूजा या आराधना करना निर्थक है. ऐसी पूजा से केवल भय और दूरी पैदा होती है.
(संपादित लेखांश मौन की गूंज "श्री श्री रविशंकर " से साभार)
जब धर्म और राजनीति साथ-साथ नहीं चलते, तब हमें भ्रष्ट राजनीतिज्ञ और कपटी धार्मिक नेता मिलते हैं. एक धार्मिक व्यक्ति, जो सदाचारी और स्नेही है, अवश्य ही जनता के हित का ध्यान रखेगा और इसलिए एक सच्चा राजनीतिज्ञ बनेगा. सभी अवतार और महान उपदेशकों ने हमेशा लोक-हित का ध्यान रखा और इसलिए, राजनीति में रहे. और एक सच्चा राजनीतिज्ञ केवल सदाचारी और स्नेही ही हो सकता है, इसीलिए उसे धार्मिक होना ही है.
पूजा करने की स्वतंत्रता पर, या पूजा की विधियों पर जब धर्म बंदिश लगाता है, तब वह एक सामंजस्यपूर्ण समाज के सृजन के लिए अनुपयोगी हो जाता है. जब धर्म सब-कुछ को साथ लेकर चलता है और हर प्रकार की प्रार्थना या पूजा को पूरी स्वतंत्रता देता है, वह धर्म लोगों में सदाचार तथा शांति लाएगा तथा हर समाज के लिए उपयोगी होगा.
लोग सोचते हैं कि राजनीति और धर्म को अलग रखना चाहिए, क्योंकि कई धर्मो ने पूजा करने की स्वतंत्रता नहीं दी तथा सभी लोगों का एक समान ध्यान नहीं रखा. इतिहास बताता है कि धर्म ने झगड़े पैदा किए. परंतु अधार्मिक समाज ने अस्त-व्यस्तता एवं भ्रष्टाचार फैलाया है.
आज धर्म और राजनीति, दोनों में ही सुधार की आवश्यकता है. राजनीतिज्ञों को अधिक सदाचारी व आध्यात्मिक होना है. धर्म अधिक उदार, आध्यात्मिक व विस्तृत होकर पूजा की स्वतंत्रता दे और समस्त वि का ज्ञान उसमें व्याप्त हो. अपनत्व की भावना के बिना पूजा या आराधना करना निर्थक है. ऐसी पूजा से केवल भय और दूरी पैदा होती है.
(संपादित लेखांश मौन की गूंज "श्री श्री रविशंकर " से साभार)
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